मैं भाई फूलों में भूला, मेरी बहन विनोद बनी | एक कविता बिहार से


रक्षाबंधन की ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ पेश है ‘एक कविता बिहार से’| 1911 में जन्में कवि गोपाल सिंह नेपाली जी बिहार के बेतिया जिले के निवासी थे| इनके गीत फ़िल्मी गानों में भी प्रयोग हुए हैं| ‘एक कविता बिहार से’ की कड़ी में इनकी कविता ‘मुस्कुराती रही कामना’ पहले ही शामिल हो चुकी है|
अगस्त के महीने को पटनाबीट्स पर ‘आजादी के महीने’ के तौर पर मनाया जा रहा है| इसी सिलसिले को आगे बढ़ते हुए, देशभक्ति और रक्षाबंधन को एक ही माला में पिरो कर लिखी गयी यह विशेष कविता विशेष तौर पर जुड़ रही है आज के ‘एक कविता बिहार से’ से| आइये पढ़ते हैं- भाई-बहन |

भाई-बहन

तू चिंगारी बनकर उड़ री, जाग-जाग मैं ज्वाल बनूं,
तू बन जा हहराती गंगा, मैं झेलम बेहाल बनूं|
आज बसंती चोला तेरा, मैं भी सज लूं लाल बनूं,
तू भगिनी बन क्रांति कराली, मैं भाई विकराल बनूं|
यहां न कोई राधा रानी, वृंदावन, बंशीवाला,
तू आंगन की ज्योति बहन री, मैं घर का पहरे वाला|

बहन प्रेम का पुतला हूं मैं, तू ममता की गोद बनी,
मेरा जीवन क्रीड़ा-कौतुक, तू प्रत्यक्ष प्रमोद भरी|
मैं भाई फूलों में भूला, मेरी बहन विनोद बनी,
भाई की गति, मति भगिनी की, दोनों मंगल-मोद बनी|
यह अपराध कलंक सुशीले, सारे फूल जला देना,
जननी की ज़ंजीर बज रही, चल तबियत बहला देना|

भाई एक लहर बन आया, बहन नदी की धारा है,
संगम है, गंगा उमड़ी है, डूबा कूल-किनारा है|
यह उन्माद, बहन को अपना भाई एक सहारा है,
यह अलमस्ती, एक बहन ही भाई का ध्रुवतारा है|
पागल घड़ी, बहन-भाई है, वह आज़ाद तराना है,
मुसीबतों से, बलिदानों से, पत्थर को समझाना है|

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