जे भूल गइल बापू के उनका खातिर घुप्प अन्हरिया बा | एक कविता बिहार से

2 अक्टूबर है आज, भारत का एक और राष्ट्रीय पर्व, जो मनाया जाता है बापू के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में| आज देश के दूसरे तथा सफलतम प्रधानमंत्रियों में से एक श्री लाल बहादूर शास्त्री जी का भी जन्मदिवस है| पटनाबीट्स इन दोनों महात्माओं का नमन करता है|
आज ‘एक कविता बिहार से’ की पेशकश देश के राष्ट्रपिता से संबोधित महात्मा गाँधी जीअर्थात् बापू को समर्पित है| कवि का नाम है कलक्टर सिंह केसरी जी, जो बिहार के भोजपुर के एकवना घाट से संबंध रखते हैं| इनका जन्म आजादी के पहले 1909 ई० में हुआ|
पटनाबीट्स पर ‘एक कविता बिहार से’ में पढ़ते हैं श्री केसरी जी की भोजपुरी कविता ‘बापू’|

बापू

कइसे मानीं हम जोत चान-सूरुज के उतरल माटी में?
कइसे मानीं भगवान समा गइलन मानुस के काठी में?
जर गइल फिरंगिनि के लंका, बाजलि आजादी के डंका,
अइसन अगिया बैताल जगवलन कइसे एक लुकाठी में?

कइसे मानी हम बापू के परगास नजर से दूर भइल?
अबहूँ बाड़न ऊ आसमान के चमचमात जोन्हीं अइसन!

जे भूल गइल बापू के उनका खातिर घुप्प अन्हरिया बा।
जे उनुकर नीति निबहले बा उनुका खातिर दुपहरिया बा।
जेकरा भीतर के आँख रही, ऊ बापू के अबहूँ देखी।
जे आन्हर बा उनुका खातिर त परबत बनल देहरिया बा।

हम समुझत बानीं मौत खेल ह, एगो आँखमिचौनी सन।
बापू रहलन इंसान बात ई लागत अनहोनी अइसन।

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