एक आवाज़ में आवाज़ मिलाते हुए लोग | एक कविता बिहार से

“लुत्फ़ हमको आता है अब फरेब खाने में,

आजमाए लोगों को रोज आजमाने में|

दो घड़ी के साथी को हमसफ़र समझते हैं,

किस कदर पुराने हैं, हम नये जमाने में|

तेरे पास आने में, आधी उम्र गुज़री है,

आधी उम्र गुजरेगी, तुझसे दूर जाने में|”

 

कवि-परिचय में ये शेर देख कोई भी समझ सकता है, आज हमारे सामने प्रस्तुति एक “शायर” की होगी|

जी हाँ!एक कविता बिहार से” के लिए आज जो रचना आपके सामने आएगी उसे चुनना वाकई मुश्किल रहा है| इनकी ग़ज़लें पढ़नी शुरू करो तो हर ग़ज़ल के साथ एक रिश्ता सा, एक अपनापन सा बनता चला जाता है| एक से बढ़कर एक शेर पढ़ने के बाद गहन दिमागी पशोपेश के बावजूद किसी ‘एक’ को नहीं चुन पाई तो इनकी पसंद इन्हीं से पूछ बैठी| ज्यादा क्या कहूँ इनकी रचना के बारे में| 11 जुलाई 1959 ई० में बिहार के आरा जिले में जन्में, शब्दों के माहिर खिलाड़ी और सकारात्मक व्यक्तित्व के धनी श्री “आलम खुर्शीद” जी, नये जमाने के ग़ज़लकारों में जाना-पहचाना नाम हैं| इनकी इजाज़त और इन्ही की पसंद से हमारी कड़ी में शामिल ये बेहतरीन ग़ज़ल आपके सामने है|

 

तख्ते-शाही! तेरी औकात बताते हुए लोग,

देख! फिर जमा हुए खाक उड़ाते हुए लोग||

तोड़ डालेंगे सियासत की खुदाई का भरम,

वज्द में आते हुए, नाचते-गाते हुए लोग||

कुछ न कुछ सूरते-हालात बदल डालेंगे,

एक आवाज़ में आवाज़ मिलाते हुए लोग||

कोई तस्वीर किसी रोज़ बना ही लेंगे,

रोज पानी पे नये अक्स बनाते हुए लोग||

कितनी हैरत से तका करते हैं चेहरे अपने,

आईना-खाने में जाते हुए, आते हुए लोग||

काश! ताबीर की राहों से न भटकें आलम,

बुझती आँखों में नये ख्वाब जगाते हुए लोग||

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