बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार के लिए नामित चंदन तिवारी की पटनाबीट्स से बातचीत

चंदन तिवारी, भोजपुरी गानों की लोक गायिका जिन्होंने भोजपुरी लोक गीत के अस्तित्व को बचाये रखा है , उनके गानों में पुराने भोजपुरी गीतों को नए तरीके से गाने की कोशिश की है ,और उसको नई पहचान दिलाई है । आज चंदन तिवारी ने अपने गानों में उस्ताद बिस्मिल्लाह खां पुरस्कार के लिए नामित किया गया है ।
साहित्य कला अकादमी द्वारा बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार के लिए नामित भोजपुरी लोक गायिका चंदन तिवारी ने पटना बीट्स से बातचीत की और अपने संगीत के सफ़र के अनुभव को साझा किया।

1.आपने  लोकगीत को गानें की शुरुआत कब की?

चंदन तिवारी— फोक गाने की शुरुआत स्कूली दिनों से ही हुई. स्कूल में जाती थी तो वहां प्रतियोगिताओं में भाग लेती थी. स्कूल के हर फंक्शन में राष्ट्रीय गीत वगैरह गाती थी. मेरी मां भी गाती थी. मैं घर आती तो मां को लोकसंगीत गाते हुए सुनती तो मन लोकसंगीत की ओर ही रमता गया. बाद में प्रयाग संगीत समिति से शिक्षा प्राप्त की लेकिन मन में हमेशा लोकसंगीत बसा रहा और बाद में लोकसंगीत ही गाने लगी |

2.इतने सालों से गाती आ रहीं है, अब तक कितने गानों को रिक्रियेट किया है?

चंदन तिवारी— कितने गानों को रिक्रियेट की यह तो नहीं बता सकती, क्योंकि मैं जितने शो होते हैं मेरे, उस शो के लिए अलग तैयारी करती हूं. हर शो कंसर्ट के मिजाज के अनुरूप नये गाने को जोड़ते चलती हूं. हां, लेकिन यह कह सकती हूं कि पिछले चार साल से पुरबियातान के सफर में करीब 40 रचनाकारों के गीतों को गाने की कोशिश की.इनमें कुछेक गीतकारों को छोड़ दिया जाए तो ढेरों के गीतों को पहली बार ही स्वर मिला. शुरुआत तो महेंदर मिसिर और भिखारी ठाकुर के गीतों से की लेकिन बाद में शिवप्रसाद किरण, मुरारी शरण, महादेव सिंह. रसूल मियां, मूसा कलीम. दिलदार खान, जगेसर कवि. रमापति रसिया, रामजियावन बावला, सुंदर वेश्या जैसे ढेरों रचनाकारों के भोजपुरी गीत गाती गयी. कैलाश गौतम के कई गीतों को गायी. मैथिली में स्नेहलता को गायी, मगही में मथुरा प्रसाद नवीन जैसे रचनाकारों को. मेरी कोशिश रहती है कि रचनाकारों को उनका श्रेय दूं. वे गीत लिखकर चले गये हैं तो उनके गीत सदा सदा के लिए गाने से ही संरक्षित होंगे. सिर्फ किताबों में रहने से नहीं. उन्होंने गीतों कर रचना गाने के लिए ही की होगी. इसी तरह का सफर है. फिर मोहम्मद खलील, भोलानाथ गहमरी, विंध्यवासिनी देवी आदि के गीतों को रिक्रियेट करने की कोशिश की. ऐसे ही कोशिशें करती रहती हूं |

3.घर परिवार से कितना सहयोग मिला?

चंदन तिवारी— घर—परिवार का पूरा सहयोग मिला.मां से ही संगीत सिखती थी. पापा शहर में होनेवाले आयोजन में लेकर जाते थे. मैं जाकर सुनती थी. इस तरह घर का पूरा सहयोग रहा लेकिन शुरू में बहुत परेशानियां हुई. गांव से रही हूं. गांव से ताल्लुक रहा है. जब गाना शुरू की तो लोग तरह तरह की बातें करते थे कि गवनिया बजनिया बन गयी. अजीब तरीके से देखते थे लेकिन मैं लगी रही. किसी की परवाह नहीं की. कुछ सालों के बाद जब टीवी शो वगैरह में आने लगी. कई मंचों से सम्मान मिलने लगा. अखबार वगैरह में नाम आने लगा तो वही लोग जो ताने दिया करते थे वे भी अपने बच्चों को गीत—संगीत की दुनिया में लाने लगे. यह मेरे लिए सुकून का मामला था. वर्षों पहले इसी जड़ता को तोड़ने का काम विंध्यवासिनी देवी जैसी गायिका ने किया था. शारदा जी ने किया लेकिन अभी भी जड़ता बाकि है. खैर, अब तो समय बदल रहा है. लोग अपने बच्चों को संगीत में लाना चाहते हैं नहीं तो कुछ साल पहले तक भी लड़कियों केा सार्वजनिक मंचों से लोकसंगीत गवाने में लोगों को हिचक होती थी. यह मैं अपने अनुभव के आधार पर कह रही हूं |

4.आज के भोजपुरी गानों को लेकर आपकी राय?

चंदन तिवारी— भोजपुरी में समृद्ध साहित्य रहा है. लोकपरंपरा में अथाह साहित्य है. एक से एक रचनाकार हुए. जब साहित्य और गायकी में रिश्ता था तो भोजपुरी अपने स्वर्णिम दौर में रही लेकिन पिछले तीन दशक से यह नाता टूट गया और भोजपुरी सरोकार की बजाय बाजार की ओर ज्यादा रूख अपना लिया. नतीजा यह हुआ कि बाजार अपने तरीके से आपरेट करने लगा. बाजार के अपने कायदे होते हैं. मोर एंड मोर प्रोफिट चाहिए होता है.बाजार के केंद्र में स्त्री रहती है. भोजपुरी गीतों की दुनिया में स्त्री को केंद्र में लाया गया. स्त्रियां पहले भी केंद्र में थी. स्त्रियां तो हमेशा ही लोकगीतों के केंद्र में रही हैं. लोकगीत स्त्रियों का ही होता भी है लेकिन नये दौर में भोजपुरी गीतों में स्त्री का तन केंद्र में लाया गया, मन को हाशिये पर धकेला गया. गीतों के जरिये स्त्रियों पर आक्रमण हुआ. दूसरी विडंबना भोजपुरी की अपनी थी. यह समाज वर्षों से नायक और गायक का समाज बना हुआ था. अपने समाज से नायिकाओं और गायिकाओं को देता नहीं था. इसलिए बाजार को और सुविधा हुई. वह अपनी शर्तों पर स्त्री की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करनेवाला गीत रचता रहा. आज भी स्थिति वही है. स्टारडम की चाहत अधिक लोगों को है. पब्लिब डीमांड का वास्ता देकर लोग बनी बनायी राह पर चलते हैं. जबकि भोजपुरी की जरूरत है कि पब्लिक डीमांड को ही बदला जाए. यह कलाकार और रचनाकार मिलकर ही कर सकते हैं |

5.बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार के लिए बिहार से आपको नामांकित होने पर कैसा लगा?

चंदन तिवारी— कोई भी सम्मान या पुरस्कार हमेशा खुशी देता है. यह खुशी की बात है लेकिन यह सम्मान मेरा अकेले का नहीं है. यह बिहार की लोकसंगीत की समृद्ध परंपरा का सम्मान है. यह उन तमाम पुरखे रचनाकारेां का सम्मान है जिन्होंने अपने जमाने में खूब रचा और अब उनके गीतों को खोजकर मैं गाने की कोशिश करती हूं. यह हमारी मातृभाषा का सम्मान है. यह हमारे उन सभी साथियों,सहयोगियों और श्रोताओं का भी सम्मान है, जिन्होंने हमेशा मेरे मनोबल को बढ़ाया. वे मनोबल न बढ़ाते तो मुझमें यह आत्मबल कहां से आता कि मैं इसी रास्ते चल सकूं. इसलिए यह सम्मान मेरे नाम पर मिलेगा लेकिन इसमें हिस्सेदारी सबकी है. मैं यह सम्मान सबको समर्पित भी कर रही हूं.

6.राज्य में आपको लोकगायक के तौर पर पहचान मिल चुकी है, अब ये पहचान राष्ट्रीय होने जा रही है, इसको लेकर आप क्या कहेंगी?

चंदन तिवारी— संगीत भाषा और भूगोल की सरहद तोड़ जितनी दूर तक जाये, वह अच्छा होता है. गायक या कलाकार के लिए तो होता ही है कि उसे देश भर में अवसर मिल रहा है लेकिन इससे देश का अजनबीपन भी खत्म होता है. आप ऐसे सोचिए कि शारदा सिन्हा ने मैथिली और भोजपुरी समाज के बीच कितने अजनीबपन को खत्म किया है? उन्हेांने अपने गीतों से इसे बहुत हद तक खत्म किया है.शारदाजी के मैथिली गीत भोजपुरी लोग भी खूब सुनते हैं, मगही लोग भी सुनते हैं और शारदाजी के भोजपुरी गीत मैथिली में भी सुने जाते हैं. किसी भी लोकभाषा का संगीत जितनी जगह यात्रा करेगा, वह देश के अजनबीपन को, सांस्कृतिक दूरियों को खत्म करने का काम करेगा. वैसे मेरा सौभाग्य रहा है कि कम समय में ही देश के अनेकानेक राज्यों में जाने का मौका मिला. निमंत्रण मिला |

7.भोजपुरी लोकगीत को आगे ले जाने के लिए हम क्या कर सकते है?

चंदन तिवारी— मेरी कोशिश होगी कि अतीत को वर्तमान से और वर्तमान को भविष्य से जोड़ूं. लोकसंगीत एक परंपरा है जो पीढ़ी दर पीढ़ी एक दूसरी पीढ़ी से जुड़ते हुए आगे बढ़ती है. मैं लोकसंगीत को सरोकार के साथ गाना चाहती हूं. अभी मैं साझी संस्कृति पर काम कर रही हूं. रसूल के राम, मूसा कलीम के रामराज, ये दो मेरे प्रोजेक्ट हैं, जिसे मैं पूरा की हूं. इसे आगे बढ़ा रही हूं. लोकगीतों की स्त्रियां—लोकगीतों में स्त्रियां विषय पर काम कर रही हूं. इससे यह बताने की कोशिश करूंगी कि यह लोकगीत स्त्रियों का विषय रहा है, लेकिन हालिया दशक में स्त्रियों को सिर्फ एक वस्तु की तरह लोकगीतों में लाया गया. इसके लिए मैं पिछले तीन सालों से ऐसे गीतों को तलाशने का काम की हूं. मेरी यह कोशिश होगी कि लोकसंगीत नैरेटिव हो. हर लोकगीत की एक कथा होती है. गीत का नैरेशन भी हो. यही कोशिश कर रही हूं. बच्चों के लिए गीत पर काम कर रही हूं. बच्चों को कनेक्ट करने से आगे सबकुछ ठीक रहेगा |

8.भोजपुरी लोकगीत पर काम करने के लिए PatnaBeats के लिए कोई सुझाव ?

चंदन तिवारी— पटनाबीट्स तो मेरा शुरू से अपना मंच रहा है. जिस दिन से शुरू हुआ, तब से इससे अपना खास रिश्ता है. मैं इससे अलग कभी अपने को नहीं मानी बल्कि हमेशा यह लगता है कि यह तो अपना ही जंक्शन है. पटनाबीटस जिस तरह का काम बिहार पर कर रहा है, वह अनोखा है. हालिया दिनों में संगीत में एक गुमनाम गायिका को खोजकर फिर उनकी प्रस्तुति कराने का काम पटनाबीटस ने किया. इसी तरह पटनाबीट्स ने बिहार से एक कविता की शुरुआत की. पटनाबीट्स बिहारी स्वैग को जिस तरह से पॉपुलर कर रहा है वह बिहारी अस्मिता को मजबूत करनेवाला है. पटनाबीट्स पर मैं लिखते भी रही हूं, मेरे गाने भी साझा होते रहे हैं. मेरी कोशिश होगी कि मैं पटनाबीट्स के लिए भी कुछ अलग से करूं, क्योंकि यह बिहार की सांस्कृतिक धरोहर को पुनर्जीवित करनेवाला मंच है. मैं बिहारनामा नाम से एक सीरिज कर रही हूं. वह पटनाबीट्स के लिए भी होगा |

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