बिहार के चित्रकला के इतिहास में बड़ा नाम है, पटना कलम

बिहार की धरती चित्रकला व कलाकारी में सदियों से धनी रहा है। इसलिए बिहार को समय-समय पर परिवर्तनों का प्रदेश भी कहा गया है। यहां पर कला क्षेत्र में नया उन्मेष और विभूतियों को सजाने वाले कलाकारों का उद्भव होता देखा गया है, जिसने कला क्षेत्र में उर्वर भूमि को तैयार करने में कोई कमी नहीं छोड़ा है।

कला को जीवित तभी बनाए रखा जा सकता है, जब वह क्षितिज की मिट्टी और आम लोगों की संस्कृति से जुड़ी हो। उन्हीं में से एक है पटना कलम। जो बिहार की भोजपुरी मिट्टी में सज-संवर कर कला की बेहतरीन रूप आई है। उसे अब हम लोग पटना शैली या पटना कलम के नाम से जानते हैं।

पटना कलम का इतिहास

पटना कलम का प्रारंभिक चित्रकार मुगल शासन काल से माना जाता है। लेकिन जैसे ही मुगल शासन काल का अंत होने लगा, तो चित्रकारों के कई दल दिल्ली शहर छोड़कर आजीविका की खोज में देश के विभिन्न शहरों में निकल पड़े। क्योंकि दिल्ली में उनके सम्मान और बेहतरीन चित्र शैली पर पुरस्कृत करने वाला कोई नहीं बचा था।

उनमें से कुछ चित्रकार मुर्शिदाबाद चले गए। जहां से बाद में अधिकतम कलाकार सन 1760 के आसपास में मच्छरहट्टा (पटना सिटी) चौक, दीवार और मोहल्ला में आ बसे। तब पटना आर्थिक दृष्टिकोण से संपन्न शहर हुआ करता था। यहां भी राजे रजवाड़े चित्र शैली के शौकीन हुआ करते थे, जिनके द्वारा उन चित्रकारों को सम्मानित भी किया जाने लगा और चित्र शैली में विस्तार भी देखा गया।

आम जन-जीवन से जुड़ी चित्र शैली है, पटना कलम

भारतीय चित्रकारी शैली में पटना कलम एक ऐसी कलाकारी है जो सीधा-सीधा आम जन-जीवन से जुड़ी हुई है। इस शैली के चित्रों की खासियत यह थी कि यह बिना किसी विषय वस्तु के रेखांकित किए जाते थे। ये मुख्यत: रोज़मर्रा के जनजीवन पर आधारित हुआ करते थे। जिसे प्राकृतिक रंगों से कागज़ पर बनाया जाता था। पटना कलम के चित्र शैली में समकालीन जन-जीवन का बड़ा ही सजीव और प्रभावशाली चित्रण किया गया है।

पटना चित्र शैली के विकास के बाद कुछ समय के लिए निशा काल भी आया। जब फोटोग्राफी का आविष्कार हुआ था। तब पटना कलम पर प्रतिकूल असर पड़ने लगा था। सन 1760 से 1947 तक पटना कलम का उत्कर्ष काल माना जाता है तथा सन 1997 के बाद पटना कलम पूरी तरह विलुप्त सा हो गया। कला के विद्वानों ने ईश्वरी प्रसाद वर्मा को पटना कलम का अंतिम चित्रकार माना है।

पटना कलम शैली, फोटो साभार- ट्विटर कात्यान मश्रा

कालांतर में पटना कलम को जीवंत बनाए रखने का काम उपेंद्र महारथी कला एवं अनुसंधान केंद्र पटना कर रहा है, जिसे और भी विस्तृत करने की ज़रूरत है।

मध्य 18वी शताब्दी में चित्रकला के तीन स्कूल थे,

  • मुगल,
  • एंग्लो- इंडियन और
  • पहाड़ी।

लेकिन पटना कलम ने इन सब के बीच तेज़ी से अपनी जगह बना ली। यही शैली बाद में इंडो-ब्रिटिश शैली के नाम से जाने-जानी लगी।

पटना कलम हस्त-चित्रकला शैली है, जिसे मुख्यतः कुची से बनाई जाती है। जिसमें राजदरबार से संबंधित घटनाओं और दृश्यों के साथ-साथ दैनिक जीवन की साधारण घटनाओं पर भी चित्रकारी की जाती है।
पटना कलम शैली, फोटो साभार- ट्विटर

वर्तमान में पटना कलम की संरक्षित प्रतियां

पटना कलम आमजन जीवन से जुड़ी हुई होने के कारण इसे देश-दुनिया के विभिन्न स्थानों पर संरक्षित करके रखा गया है। जिसमें पटना संग्रहालय, जलान संग्रहालय- पटना सिटी, चेतन पुस्तकालय- गायघाट, पटना खुदाबख्श उर्दू लाइब्रेरी- अशोक राजपथ पटना, कला एवं शिल्प महाविद्यालय- पटना,राष्ट्रीय संग्रहालय- कोलकाता और विक्टोरिया पैलेस- कोलकाता, विक्टोरिया अल्बर्ट संग्रहालय- लंदन भी शामिल है जहां पटना कलम से जुड़ी हुई चित्रशैली को आम लोगों को देखने व परखने के लिए संरक्षित करके रखा गया है।

Article Source- Youth Ki Awaaz(Nitesh Kumar Sinha)


Do you like the article? Or have an interesting story to share? Please write to us at [email protected], or connect with us on Facebook and Twitter.


Quote of the day- We all have two lives. The second one starts when we realize we only 
have one.- Tom Hiddleston

Also Watch-

Comments

comments