दुइ मुट्ठी : सात समुन्दर पार से आयी भोजपुरी की एक मीठी आवाज़

गिरमिटिया“, ये नाम बिहार के इतिहास के उन दर्दनाक पन्नो में दफन है जिन्हे आज भुलाया जा चुका है। ये नाम उन मजदूरों को दिया गया था जिन्हे सत्रहवीं शताब्दी में भारत आये अंग्रेज़ गुलाम बना कर  हज़ारो हज़ार की संख्या में सात समुन्दर पार  फिजी, दक्षिण अफ्रीका, ब्रिटिश गुयाना, कैरेबियन द्वीपों, सूरीनाम वगैरह जैसे अपने उपनिवेशों में मजदूरी करने भेजते थे। गिरमिट शब्द अंग्रेजी के “agreement” शब्द का अपभ्रंश है। अंग्रेज़ यहां के गरीब मजदूरों का अंगूठा सादे कागज़ पर लगा उन्हें बाध्य करते थे कि वो पानी के जहाज़ों पर बैठ, कई महीनो की दुर्गम यात्रा कर अपने मुल्क, अपनी मिट्टी से दूर पराये देशों में गुलामी का जीवन जियें। हर साल 10 से 15 हज़ार गिरमिटिया को यहां से भेजा जाता था।

सन 1834 से शुरू हुई इस अमानवीय व्यवस्था को आख़िरकार सन 1917 में बंद किया गया। तब तक लाखों लोग इस गुलामी की प्रथा के शिकार हो चुके थे। लेकिन हमारी हार न मानने की ज़िद का ही परिणाम रहा कि आज उन गिरमिटिया मजदूरों की अगली पीढ़ियां जिस भी देश में है वे उस देश की समृद्धि में अपना योगदान दे रही है। फिर भी आज तक अपनी मिट्टी से दूर किये जाने की कसक उनमें बाकी है। और इस कसक को आवाज़ दे के एक बहुत ही खूबसूरत गाने की शक्ल में हमारे सामने ले के आये हैं नीदरलैंड के रहने वाले राज मोहन। पहले आप भोजपुरी और सरनामी में गाया हुआ ये मधुर गीत “दुइ मुट्ठी” सुनिए

इस गीत में बात है सूरीनाम भेजे गए गिरमिटिया मजदूरों की। उसके अपने परिवार और अपने वतन से जुदा होने की तकलीफ की। जिस तरह का अमानवीय व्यवहार उसे पराये मुल्क में झेलना पड़ा, जैसे उसे दाने दाने के लिए मोहताज किया गया, उसकी आज़ादी उस से छीन कर बेड़ियों में डाल गुलाम बनाया गया उस हर दर्द को बड़ी ही खूबसूरती से इस गीत में पिरोया गया है। इसका संगीत बड़ा ही मनमोहक है।  इस अंदाज़ में भोजपुरी को प्रस्तुत करना एक सराहनीय प्रयास है। और इसके लिए इस गीत को बनाने वालों का बहुत बहुत शुक्रिया और बधाई।
जिस तरह  हाल के वक़्त में इस उपेक्षित भाषा के संगीत को एक कंटेम्पररी तरीके से पेश करने की जो कोशिश शुरू हुई है वो प्रशंसनीय है। ये हमें ऐसी उम्मीद बँधाती है कि भोजपुरी के गौरव का सूरज अभी अस्त नहीं हुआ है। इसकी आग अभी भी बाकी है और ज़रूरत है कि इसे और हवा दी जाये।  इसी मुहीम में पिछले दिनों एक और बड़ा योगदान आया नितीन चंद्रा और “निओ बिहार” की तरफ से जिन्होंने एक क्लासिक भोजपुरी गाने “सोनवा के पिंजरा” को बड़े  ही खूबसूरत और कंटेम्पररी अंदाज में पेश किया

ज़रूरत है कि ऐसी कोशिशों को और प्रोत्साहित किया जाये और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक इसे फैलाया जाये ताकि हमारे संगीत की बनी बनाई बुरी छवि को तोडा जा सके। और इसके अलावा उम्मीद है कि हमारे यहां के भोजपुरी संगीत के क्षेत्र में मौजूद लोग इस से प्रेरणा ले कर इस खूबसूरत विरासत को सहेजने में अपना योगदान देना शुरू करेंगे।

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