भोजपुरी सिनेमा निराशाजनक वर्तमान से आशान्वित भविष्य की ओर

This article has been written by Nitin Neera Chandra

भोजपुरी फिल्म” । ये दो शब्द एक ऐसा वाक्य बना देते हैं जिसके बारे में लोग अलग अलग राय रखते हैं । अमूमन एक भाव सबके अंदर आता है । “अश्लील” या “फूहड़” । मैं उस विश्लेषण में नहीं पढ़ना चाहता की फूहड़ क्या है और अश्लील क्या है । ये एक आम राय है और मैं भी इससे सहमत हूँ ।

सिर्फ सस्ती सुरुराहट और नसों को गरम कर देने की कवायद भर रह गया है ये सिनेमा, जो कुछ गरीबों के वासना भरे कुंठा को ठंडा कर देता है । इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है प्रियांका चोपड़ा द्वारा बनाई गयी फिल्म “बम बम बोल रहा है काशी” ।  भोजपुरी सिनेमा बनाने वालों ने एक ऐसे वर्ग को शिकार बनाया जो सुबह कमाता और शाम को खाता है । उसकी बौद्धिकता घर पर पैसे भेजने भर सीमित है । उस वर्ग के ऊपर क्यों होगी साहित्य, संस्कृति, पहचान इत्यादि को बढ़ाने का बोझ नहीं और ना होना चाहिए । वो आज भी नहीं कहता की भोजपुरी गंदा है या साफ़ है ।

पढ़े लिखे लोग भोजपुरी से कट चुके थे । क्यों काट चुके थे? क्योंकि भोजपुरी भाषा को कई लोग षड्यंत्र के तहत हिंदी की बोली बताते रहे । इसकी लिपि को तो पहले ही सम्पात कर दिया गया था । इसके साहित्य को दबा दिया गया । उदय नारायण तिवारी और ग्रियर्सन की बाते छुपा ली गईं । भोजपुरी भाषियों पर हिंदी थोप दी गयी और आज भी इसे आठवी सूची में नहीं डाला जा रहा । अनिवार्य स्कूली शिक्षा के साथ रोजगार के साधन, दोनों, जिस भाषा में नहीं होंगे उस भाषाई समाज का आर्थिक और बौद्धिक विकास भी संभव नहीं है आज के दौर में । जिस वक्त दूसरी तमाम भाषओं में साहित्य को लेकर काम हो रहा था उस वक्त भोजपुरी भाषी साहित्यकार हिंदी का रुख कर चुके थे । तो जिम्मेदार कौन है  ? हम सब साहब ।

लेकिन अब आगे क्या ? मैं इस लेखन के माध्यम से आगे का रास्ता सुझाने की कोशिश कर रहा हूँ । “भोजपुरी फिल्म + सिनेमाघर” ये माध्यम अब दूषित हो चुका है । इस माध्यम से भोजपुरी सिनेमा में नया दौर नहीं आएगा । नया दौर लाने के लिए विषय-वस्तु, माध्यम, चेहरे और श्रोता सब बदलने पड़ेंगे । मसलन सिनेमाघरों से नहीं, ना ही अभी के स्थापित “कलाकारों” से ना ही उन विषयों से जिनपर फिल्म बन रही हैं और ना ही अभी जो दर्शक वर्ग है, इन सबों से भोजपुरी सिनेमा बदलने वाला है । बहुत चिंता की बात नहीं है । अभी का भोजपुरी सिनेमा सिर्फ १० – १५ % लोगों तक ही पहुंचा है ।  वर्ग जो भोजपुरी बोला या समझता वो अभी भी इन्तेजार में है कुछ अच्छा आए ।  ।  लेकिन पहले ये समझना होगा की सिनेमा की जरुरत क्यों है ? देखिये सिनेमा उतना ही जरुरी है जितना साहित्य । साहित्य क्या करता है समाज के लिए ? साहित्य किसी भी व्यक्ति को समाज की इतिहास, सच या झूठ, नैतिकता या मौलिकता से जोड़ के उसके मन मस्तिष्क पर असर करता है । साहित्य भूतकाल केकई छोटे बड़ी बातों को बताता जिसपर हम भविष्य निर्माण की नींव भी रखते हैं ।  अच्छा साहित्य हमें अच्छा इंसान बनाता है । सिनेमा क्या करता है ? लगभग यही चीजें । दोनों ही समाज का आईना है । जिस समाज का साहित्य जितना मजबूत रहा उस समाज का सिनेमा भी मजबूत हुआ । भोजपुरी सिनेमा का हश्र क्यों हुआ वो तो समझ में आता है लेकिन अब आगे क्या ? या तो इसे इसके हाल पर छोड़ दें क्योंकि ये भी मरेगा ही और अगली पीढी भी वही दंश झेलेगी जो हमारी पीढी झेल रही है । मैंने अपनी पहली फिल्म “देसवा” बनाई और फिल्म कभी रिलीज नहीं हो पाई । बिहार के ७ सिनेमाघरों में हमने राष्ट्रीय पुरस्कार में योग्यता श्रेणी में आने के लिए लगाया था और बाद में हम इसको रिलीज करना चाहतेथे लेकिन निवेशकों का साथ नहीं मिला । फिर मैं ४ साल बाद मैथिली फिल्म “मिथिला मखान” बनाई जिसे बिहार का पहला राष्ट्रीय पुरस्कार मिला ।  जो अभी रिलीज नहीं हुई है । इन दोनों फिल्मों को बनाने के बाद काफी कुछ समझ में आया की आगे का रोडमैप क्या होना चाहिए ।   अभी भी ८० प्रतिशत लोग ऐसे हैं जिनकी संख्या कई करोड़ में है जो भोजपुरी समझता या बोलता है । इन तक पहुचने का माध्यम अब एक ही है, और वो है “इंटरनेट” । भोजपुरी के दर्शक जब तक मध्यम वर्गीय पढ़े लिखे लोग नहीं होंगे तब तक बदलाव नहीं आएगा । लेकिन सबसे पाहिले छठी से बारहवीं तक कम से कम भोजपुरी भाषी क्षेत्रों के स्कूलों में भोजपुरी की पढ़ाई अनिवार्य होनी चाहिए । बिहार और उत्तर प्रदेश में । तभी भोजपुरी के प्रति एक संवेदनशील समाज खड़ा हो सकेगा जो इसके साहित्य और सिनेमा को संभालेगा ।

विसुअल माध्यम को देखें तो भारत में नेटफ्लिक्स और अमेज़न प्राइम ने करोड़ों का निवेश किया है जहां पर सिर्फ इंटरनेट पर दिखाए जाने वाला कंटेंट बनाया जा रहा है ।  आज स्मार्ट फोन ही आपका टीवी और धीरे-धीरे  सिनेमाघर बनता जा रहा है । छोटे से लेकर शहरों तक जितना तेजी से इंसान “शहरी” बन रहा है उतनी तेजी से शहरों का शहरीकरण नहीं हो रहा । गांव में लड़के Bluetooth से गाने इधर से उधर कर रहे हैं । 3G से 4G हो रहा है । ऐसे में अपने श्रोता तक पहुँचना बहुत आसान हो गया है । मुम्बई में मैं ऐसे घरों कोजानता हूँ जहां टी वि नहीं हैं अब । अभी जितने भी टीवी चैनल हैं सबका अपना “App” आ चुका है । दूसरी तरफ AIB और TVF जैसे अंग्रेजी-हिंदी इंटरनेट चैनलों ने लोगों के देखने का ढांचा बदल दिया है । भोजपुरी के सैकड़ों फिल्मे YouTube पर मौजूद हैं लेकिन वही फिल्में हैं जो सिनेमाघरों में गरीबों का मानसिक और बौद्धिक शोषण करें के बाद Youtube पर फ्री में दिखाकर प्रचार से पैसा कमाती हैं । दर्शक वही हैं यहां भी । लेकिन इंटरनेट लोकतांत्रिक माध्यम है । ये ऐसा सिनेमा घर जहां एक साथ हज़ारों फिल्में लाखों लोग एक साथ देख सकते हैं ।

हम लोगों ने NeoBihar नाम का एक चैनल शुरू किया है ।  हमारा पहला वीडियो छठ का “पहिले पहिल हम कईनी” ने विश्व रिकार्ड बना दिया । मास्को, बर्लिन, कोरिया, ऑस्ट्रेलिया से फोन आये । शायद ही कोइभोजपुरी भाषी होगा जिसने वो वीडियो नहीं देखा । उसके बाद २२ जनवरी को हमने दुसरा वीडियो लांच किया, “अपना चौथा क्लास”, इन दोनों वीडियो में बहुत लोगों के भ्रम को तोड़ा और वो समझ गए की भोजपुरीमें भी ऐसा काम हो सकता है । हमारी टीम में १८ लोग हैं जो महीने का एक छोटी रकम एक अकाउंट में जमा कराते हैं जिसके इस्तमाल से ये काम हो रहा है । हमारी मैथिली लघु फिल्म “The  Suspect” भी हमलोग मार्च के अंत में रिलीज करेंगे । जो लोग भी भोजपुरी में अच्छी फिल्में बनाना चाहते हैं पहले वो लघु फिल्मे बनाकर, इंटरनेट पर रिलीज करके एक श्रोतावर्ग खड़ा करें । ये काम आसान नहीं है लेकिन ये खर्चीला भी नहीं आई । लेकिन अगर आप अभी के स्थिति में पैसा कमाने का सोचेंगे तो वो नहीं होगा । अभी पथरीले जमीन को खोदकर पोखरा बनाने की बात हो रही है । अभी से मछलियों का रेट लगाना तर्कसंगत नहीं होगा । अभी आपको दर्शक वर्ग बनाना है वो भी पढ़ा लिखा माध्यम वर्गीय शहरी  बिहारी और उत्तर प्रदेश वाले ।   YouTube चैनल बनाएं, उस पर subscriber की संख्या बढ़ाएं, कम खर्च का लेकिन बहुत हाई क्वालिटीका कंटेंट, लघु फिल्म या वीडियो कुछ भी हो बनाकर डालते जाएं । लेकिन कंटेंट आता रहे । ऐसा ना हो के आपने एक बार डाल दिया और दूसरी फिल्म या वीडियो आने में महीनो लगा रहे हों । महीने में कम से काम एक वीडियो तो डालना ही होगा ।   adsense के माध्यम से youtube पैसे भी देगा, subscriber  की संख्या बढ़ेगी तो आप निवेशक या प्रायोजक भी ला सकते हैं । देखने वालों की संख्या बढ़ेगी और यहां से एक अलग श्रोता खड़ा होगा जिसके लिए आपको सिनेमाघर जाने की जद्दोजहद नहीं करनी है । Netflix जैसी कंपनियां सिर्फ internet के लिए करोड़ों खर्च कर रही हैं । यही समय है की हम भोजपुरी – मैथिली भाषी लोग भी इन्टरनेट के माध्यम से एक दर्शक वर्ग खड़ा करें जो अब सिनेमाघरों से खड़ा करना नामुमकिन हो चुका है ।  लेकिन साथ में भोजपुरी को आठवी सूची में, स्कूलों में अनिवार्य और भोजपुरी साहित्य का विकास, ये सब होने के जरुरत है बस इक्षाशक्ति की जरुरत है ।

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Quote of the day:“I am no bird; and no net ensnares me: I am a free human being with an independent will.” 
― Charlotte Brontë, Jane Eyre

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