Anaarkali of Aarah: नारी शक्ति का तांडव | एक फिल्म समीक्षा

अनारकली ऑफ़ आरा“, इस फिल्म का इंतज़ार तब से ही था जब से इसका नाम पहली बार सुना था और इस लंबे इंतज़ार के बाद इस फिल्म को देख कर वैसी ही संतुष्टि हुई जैसी कि गर्मी से अकुलाई धरती पहली बारिश के बाद महसूस करती होगी। इस तारीफ की वजह ये इस फिल्म का बिहार से पूरी तरह जुड़ा होना नहीं है, हालाँकि वो गर्व करने लायक बात है ही। लेकिन एक सिने प्रेमी के नज़रिये से देखें तो ये फिल्म वाक़ई दिल को बाग़ बाग़ कर जाती है। आइये इस फिल्म के मुख्य पहलुओं के बारे में कुछ विस्तार से बात करते हैं।


शुरुआत करते हैं इसकी कहानी से। ये कहानी है बिहार के आरा शहर में द्विअर्थी गाने गानेवाली अनारकली की। उसके बारे में समाज में बनी तमाम धारणाओं के विपरीत अनारकली स्वाभिमानी है, उसकी ज़िन्दगी में उसके कुछ आदर्श हैं और ये ज़िन्दगी अपनी शर्तों पर जीने का निश्चय भी है। संगीत उसके लिए कमाने खाने के ज़रिये से कहीं बढ़ कर है। ये उसकी मां की सिखाई अनमोल चीज़ है जिस से वो अलग नहीं होना चाहती, फिर चाहे हालात उसे ऐसा करने पर मजबूर ही क्यों न करे। उसका संगीत से प्यार इस क़दर मजबूत है कि उसके बिना अनारकली अनारकली नहीं रहती। संगीत उसके लिए सांस लेने जैसा महत्वपूर्ण हिस्सा है जिस से वो जब दूर होती है तो जीना नहीं चाहती। ज़ाहिर सी बात है कि उसके इर्द गिर्द के ज़माने को इन सब से कोई मतलब नहीं और उनके लिए अनारकली महज एक नाचने और भोगने वाला जिस्म है। यही वजह होती है कि शहर का एक रसूखदार इंसान उसे सरेआम बेइज़्ज़त करने की घिनौनी हरकत करता है। इसके जवाब में उसे एक ज़ोरदार थप्पड़ मिलता है जो कि एक औरत के उस समाज के खिलाफ विद्रोह की शुरुआत होती है जो ये अभी तक नहीं समझ पाया है कि औरतों के ‘ना’ के भी कुछ मायने होते हैं। इस विद्रोह की कहानी को इस फिल्म में बड़े ही असरदार तरीके से रखा गया है। ये कहानी भले ही आरा की पृष्ठभूमि पर बनाई गयी हो लेकिन इसका विषय न सिर्फ हमारे देश बल्कि पूरी दुनिया के लिए मायने रखता है। इस फिल्म की एक बात जो मुझे सबसे अच्छी लगी वो ये है कि “पिंक” और “दंगल” जैसी नारी शक्ति पर बनी फिल्मों से अलग अनारकली की लड़ाई को किसी पुरुष की छत्रछाया की ज़रूरत नहीं पड़ती। जब भी ऐसा लगने लगता है कि अब इसे किसी मर्द का सहारा लेना होगा, तब अनारकली हमें गलत साबित करती हुई और मजबूत हो कर अपनी लड़ाई खुद के बलबूते पर लड़ती नज़र आती है। इस बात के लिए लेखक-निर्देशक अविनाश दास की जितनी तारीफ की जाये वो कम है।

अब आते हैं अभिनय पर। इस फिल्म का हर एक किरदार, चाहे वो एक छोटे से सीन भर ही क्यों न हो, अपनी छाप छोड़ जाता है। ये कमाल है इस फिल्म के हर एक्टर की कला का और ऐसे कलाकारों की जमात इकठ्ठा करने का श्रेय लिए फिल्म के कास्टिंग डायरेक्टर जितेंद्र नाथ जीतू को जाता है। फिल्म की मुख्य स्टारकास्ट जैसे गुणी लोग हैं उस हिसाब से तो ज़ाहिर है कि उन्होंने बेजोड़ performance दी है। अनारकली का रोल स्वरा भास्कर से बेहतर शायद ही कोई और अदाकारा कर सकती थी। अनारकली के अंदर का रोष, वो विद्रोह करने की ताकत और किसी भी किस्म के दबाव में आ कर अपने सिद्धांतों से समझौता न करने की ज़िद को उन्होंने बिल्कुल सच्चाई से परदे पर जीया है। संजय मिश्रा का अभिनय भी बेजोड़ है। उन्होंने एक बार और दिखा दिया है कि अब तक जो कॉमेडी रोल्स में उन्हें बांध के रखा गया था बॉलीवुड में उस से भारतीय सिनेमा कितने बेहतरीन चरित्रों से वंचित रह गया है। पंकज त्रिपाठी ने जिस बारीकी से रंगीला के करैक्टर की दो झलकियों का फर्क और उसके अंदर चल रहे अंतर्विरोधों को परदे पर उतारा है वो जल्दी देखने को नहीं मिलता। इस मुख्य कास्ट के अलावा छोटे छोटे रोल्स और साइड रोल्स में जो कलाकार हैं उन्होंने ने फिल्म में चार चांद लगा दिए हैं। हीरामणि के रोल में इश्तियाक खान ने बहुत ही असरदार काम किया है। उनका इस फिल्म का एक डायलॉग बड़े ही लंबे वक़्त तक बोला जायेगा। इसके अलावा अनवर का चुप चुप रहने वाला और दिल में अनारकली से निर्बोध प्रेम करने वाले रोल को युवा अभिनेता मयूर मोरे ने बहुत ही बखूबी किया है।

फिल्म संगीत पर आधारित है और इसके साथ रोहित शर्मा का संगीत पूरी तरह न्याय करता है। इस फिल्म के संगीत में हर तरह के पहलु हैं। कुछ गाने जो कि अनारकली को स्टेज पर गाने होते हैं उन गानों को फूहड़ होने के डर से उसे जबरन श्लील होने का नक़ाब नहीं पहनाया गया है। असलियत को बिना ढांके प्रस्तुत किया गया है। हालांकि इस से किसी को भी ये नहीं मान लेना चाहिए ये फिल्म किसी तरह से बिहार के संगीत में फूहड़पने को प्रोत्साहित करती है या यहाँ के संगीत को बुरी दशा में दिखाने का प्रयास करती है। ये हमें आइना दिखाती है। इसके अलावा इसमें रेखा भारद्वाज की आवाज़ में एक खूबसूरत ठुमरी “बदनाम जिया दे गारी” और सोनू निगम का गाया एक सुकून पहुँचाने वाला गाना “मन बेक़ैद हुआ” भी है जो इस फिल्म की कहानी में भी भाव डालने का बहुत अच्छा काम करता है। इस फिल्म के संगीत से स्वाति शर्मा, इंदु सोनाली और पवनी पांडे जैसी तीन गायिकाओं को सुनने का मौका मिलेगा। इनकी आवाज़ों से अनारकली का किरदार जीवंत हो उठता है। रविंदर रंधावा, डॉ सागर और रामकुमार सिंह ने मिल कर इस फिल्म के गीत लिखे हैं। फिल्म का बैकग्राउंड संगीत जिसे रोहित शर्मा ने ही दिया है वो रह रह कर पुरानी हिंदी फिल्मों के बैकग्राउंड स्कोर की याद दिलाता है।

आखिर में बात करते हैं अविनाश दास के लेखन और निर्देशन की।   उनकी यह पहली फिल्म है और उनका फ़िल्मी दुनिया में इस से बेहतर आगमन नहीं हो सकता। कहानी के बारे में जैसा कह चुके हैं कि बहुत ही दिलेरी से और असरदार तरीके से उन्होंने अपनी बात कही है। अविनाश दास की अनारकली हिंदी फिल्म के सशक्त महिला किरदारों की पहली पंक्ति में शामिल रहेगी। जब भी किसी फिल्म या कहानी का मुख्य किरदार किसी महिला का होता है तो उस पर होने वाले सवाल पुरुष किरदार पर होने वाले सवालों से अप्राकृतिक रूप से ज़्यादा होते हैं। अनारकली उस हर इम्तिहान में पास होती हुई ऐसी नायिका बन के उभरी है जो किसी नायक के भरोसे नहीं है। ऐसी महिला का किरदार लिखना जो किसी पुरुष की साथी हो सकती है लेकिन उस पर आश्रित नहीं, वाक़ई प्रसंशनीय है। और ये अविनाश दास की ईमानदार कलम की भी एक झलक है जो हमें उनकी आनेवाली बेशुमार कहानियों में भी दिखेगी। फिल्म का निर्देशन इस फिल्म को कभी भी सुस्त या बोझिल नहीं होने देता है। एक गंभीर मुद्दे पर होने के बावजूद इसमें अनावश्यक रूप से उदासी नहीं है। वक़्त वक़्त पर ऐसे पल आते रहते हैं जो माहौल को ज़्यादा भारी नहीं होने देते। एक बिहारी सेन्स ऑफ़ ह्यूमर इस फिल्म में है जो विषम से विषम हालातों में भी हमें निराश नहीं होने देता। हालांकि ये सब कुछ इस दायरे में रह के किया गया है जो इस विषय की संवेदनशीलता बनाये रखता है। बिहारी बोली, बिहार के देहात और लोगों के तौर तरीके को ऐसी सच्चाई से दिखाया गया है कि लगता है हम अपने पास पड़ोस को ही परदे पर देख रहे हैं। अनारकली ऑफ़ आरा अविनाश दास के आने वाले बेहतरीन करियर की ज़मीन बना रहा है और हमारा ये विश्वास है कि आगे सुधारों की गुंजाईश को देखते हुए इनकी आनेवाली फिल्मे और बेहतरी की ओर बढ़ेगी।

अनारकली ऑफ़ आरा बिहारियों से बनी बिहार की एक ऐसी फिल्म है जो उस मुद्दे को बड़ी मजबूती से उठाती है जिस पर इस वक़्त बात करना बेहद ज़रूरी है। और अंत में बस यही कहेंगे कि ये फिल्म ज़रूर देखिये, हमारे लिए नहीं तो देश के लिए देखिये।

 


Quote of the day:"I raise up my voice—not so I can shout, but so that those without a voice can be heard...
we cannot succeed when half of us are held back." ―Malala Yousafzai

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