मोहल्ला से मुम्बई तक । जानिए अविनाश दास और उनके सफर की कहानी, उन्ही की ज़ुबानी

अब तक पेशे से पत्रकार रहे अविनाश दास अब “अनारकली ऑफ़ आरा” के जरिये अपनी दूसरी पारी फिल्म निर्देशक के रूप में शुरू करने जा रहे हैं। इनकी शाखाएं भले ही मायानगरी मुम्बई  पहुँच चुकी है लेकिन इनकी जड़ें बिहार में ही है। हिंदी के सबसे बड़े ब्लोग्स में से एक “मोहल्ला लाइव” को शुरू  करने वाले अविनाश दास के पहले फिल्म की कहानी बिहार में ही रची बसी है। हमे एक सुनहरा मौका मिला इनसे बात कर के इनके अब तक के सफर और इनकी फिल्म “अनारकली ऑफ़ आरा” के बारे में जानने का। इनसे हुई बातचीत को आज हम आपके लिए ले कर आये हैं।

शुरू से शुरू करते हैं, तो आपके सफर की शुरुआत कहाँ से हुई? अपनी पृष्टभूमि के बारे में बताएं?

अविनाश दास: मेरा जन्म दरभंगा, बिहार में हुआ। प्राथमिक शिक्षा भी वहीँ से हुई। तब पढ़ाई में रूचि नहीं थी तो काफी विषयों में फेल हुआ। फिर घरवालों ने पढ़ने के लिए रांची भेज दिया और आगे की पढ़ाई वहीँ रह कर की। वहाँ एक रामकृष्ण मिशन की लाइब्रेरी है तो उसमे मैंने काफी वक़्त गुज़ारा। फिर मेरा परिचय नागार्जुन की रचनाओं से हुआ जिन्होंने मुझे काफी ज़्यादा प्रभावित किया तो उस तरह की चेतना जगी मन में। तभी से लिखने का चस्का लगा और मैं कवितायेँ लिखने लगा। उसके बाद से लोगों तक अपनी बात पहुँचाने की ज़रूरत महसूस होने लगी। फिर 1995 में पटना आना हुआ और 1996 से प्रभात खबर से जुड़ा। फिर दिल्ली जाना हुआ और वहां एक्ट वन (एक मशहूर थिएटर ग्रुप) से जुड़ा। आगे चल के “तरुण भारत संघ ” जो कि एक जल संरक्षण से जुडी संस्था है उनके साथ काम किया। मरी हुई नदियों के पुनर्जीवन की कहानिया लिखी जो की तरुण भारत संघ ने 5 वॉल्यूम्स में प्रकाशित भी की। और फिर मैं ’98 में वापस पत्रकारिता में आया। पत्रकारिता का सफर ऐसा रहा कि 2000 में प्रभात खबर का फीचर एडिटर बना, 2001 में प्रभात खबर के पटना संस्करण का एडिटर बना, फिर थोड़े दिन के लिए मैं दैनिक भास्कर में चला गया और उसके झाँसी संस्करण का संपादक बना फिर वापस से प्रभात खबर आ के मैंने उसका देवघर संस्करण लांच किया। 2005 में दुबारा दिल्ली की तरफ रुख किया और वहां NDTV के साथ मेरी 4-5 साल लंबी पारी चली। तब मैंने सोचा कि यार अब बहुत हो गया मीडिया, अब सिनेमा बनाया जाये। मैंने फिल्मों से जुड़े इवेंट शुरू किये और फाइनली एक स्क्रिप्ट लिखी और अब वो 24 मार्च को आपके सामने आ रही है “अनारकली ऑफ़ आरा” बन के।

पत्रकारिता के पेशे का चुनाव कैसे हुआ? इसकी कोई विधिवत पढ़ाई की थी?

अविनाश दास: जब मैं रांची में मैट्रिकुलेशन कर रहा था तब प्रभात खबर की कमान हरिवंश जी के हाथों में आयी थी। तब हमारे यहाँ आया करता था ये अख़बार। मैं और मेरा एक दोस्त विनय भरत (जो कि अभी रांची के मारवाड़ी कॉलेज में अंग्रेजी के प्रोफेसर हैं) कवितायेँ लिखा करते थे और इसी सिलसिले में हमारा हरिवंश जी के साथ मिलना होता रहता था तो उनसे जान पहचान अच्छी हो गयी थी। तो जब प्रभात खबर का पटना एडिशन शुरू हुआ , मुझे वो तारीख भी याद है , 7 अप्रैल 1996 को तो हम गए थे हरिवंश जी से मिलने। तब हमने गार्ड के हाथों उनको एक पर्ची भिजवाई थी कि उनको याद हो न हो तो वो हमें गेट पर से लेने आये थे और कहा था कि उन्हें बिलकुल याद है। मैंने उनसे इच्छा प्रकट की थी कि मुझे अख़बार में काम करना है तो उन्होंने मौका दिया और कहा कि मैं प्रभात खबर से जुड़ूं और सीखूं। तो मेरी कोई विधिवत मास कॉम की पढ़ाई तो नहीं हुई। पत्रकारिता का मेरा स्कूल एक तरह से प्रभात खबर ही रहा।

मोहल्ला लाइव कैसे और कब शुरू हुआ? इसके बारे में कुछ बताएं?

अविनाश दास: दरअसल हुआ ये था कि जब हम दरभंगा में थिएटर करते थे वहां हमारी थिएटर की दो दोस्त थी जो 1997 में वहाँ  से भाग के मुम्बई गयी थी जो कि उस वक़्त एक बड़ा काण्ड माना गया था।  मैंने उनके भागने में कुछ मदद भी की थी। मुम्बई जाने के बाद उनमे से एक हमारी दोस्त थी पूनम मालिक जिन्होंने प्रेम विवाह किया था एक मसूरी के एक लड़के से और वो मसूरी चली गयी थी। वहाँ उसके पति ने उसे छत से धक्का दे के मार दिया था। उस घटना का पता मुझे उसके मारने के 3-4 महीने बाद चला। मुझे ऐसा लगा कि एक लड़की जो अपने सपनों के लिए अपने घर से भाग के बहार गयी और ऐसे किसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना का शिकार हो गयी तो क्या वो हमेशा के लिए अनाम ही रह जाएगी ? तो मैंने कई जगह कोशिश की कि किसी तरह उसका नाम कही आ जाये और वो लोगों के जेहन में रहे। एक पत्रिका आती थी ‘कादम्बिनी’, मैंने वहाँ भी उसके बारे में लिख के भेजा।  फिर मुझे लगा कि इन पत्रिकाओं की खबर तो इनकी अगली प्रति आने के साथ ही गुम हो जाएँगी तो कोई ऐसी जगह होनी चाहिए जहाँ वो कहानिया हमेशा हमेशा के लिए रहे। तब इन्टरनेट पर ब्लॉग लिखना भारत में उतना प्रचलित नहीं था। मैंने “कल्पना ” (kalpana.it)नाम का एक ब्लॉग देखा था जो कि इटली के डॉ. सुनील दीपक चलाते थे। इटली में रहने वाले का एक हिंदीं का ब्लॉग चलाना मुझे प्रभावशाली लगा। फिर मैंने उनको पूनम मालिक की कहानी भेजी जो उन्होंने पब्लिश की। उसके बाद भी मैं उन्हें अपनी लिखी कवितायेँ वगैरह भेजता रहा और उन्होंने उसे भी अपने ब्लॉग पर जगह दी। फिर उन्होंने मुझसे कहा कि उनको अपनी रचनाएँ भेजने के बजाए मुझे खुद का ब्लॉग शुरू करना चाहिए। तभी से मोहल्ला लाइव की शुरुआत एक प्रयोग के तौर पर की। उसके पहले ही पोस्ट का काफी अच्छा रिस्पांस आया और मुझे ये बात काफी पसंद आयी कि यहाँ मैं जो चाहे लिख सकता हूँ और जिसके भी पास इन्टरनेट हो वो उसे पढ़ सकता है। इस बात ने मुझे बहुत रोमांचित किया।  फिर मेरे जो पत्रकार दोस्त थे जैसे कि रविश कुमार और पंकज पचौरी, तो वो टीवी पर तो काफी बोलते थे लेकिन लिखा नहीं करते थे तो मैंने उन्हें अपनी मनचाही चीज़े यहाँ लिखने के लिए कहा और ऐसे ही कई और पत्रकार इस से जुड़े और ये काफी बड़ा हो गया। फिर मैंने कई लोगों के अपने ब्लॉग उन्हें बना के दिए, रविश कुमार का ब्लॉग “नई सड़क” भी मैंने ही बनाया था। तब मेरी बस एक शर्त होती थी कि आप मुझे मीट-भात खिला दीजिये और मैं आपका ब्लॉग तैयार कर दूंगा। फिर हिंदी ब्लॉग का काफी चलन हो गया उस वक़्त से। और “मोहल्ला” भी काफी बड़ा हो गया था तो मैंने इसे एक वेबसाइट की शक्ल दे दी। मोहल्ला लाइव के जरिये हमने काफी सिनेमा से जुड़े इवेंट्स भी कराये जो कि प्रचलित भी हुए। तो एक तरह से मेरी पत्रकारिता के समान्तर मेरा ये “न्यू मीडिया” चलने लगा। लेकिन जैसी मेरी आदत रही है कि बनी बनाई चीज़ को छोड़ कुछ नया करने की तो मैंने इसे छोड़ अब मुम्बई का रुख कर लिया।

जीवन में किसी पेशे में स्थापित होने के बाद उसे छोड़ना एक काफी मुश्किल काम है लेकिन फिर भी आपने अपना पेशा बदलने का जोखिम उठाया तो इसके पीछे  क्या कारण रहे?

अविनाश दास: जहाँ तक पत्रकारिता में स्थापित होने की बात है तो मेरे ख्याल से मैं वो नहीं था। मैं वहाँ survive कर रहा था और पत्रकारिता बदल रही थी। अगर मैं साफ़ लहजे में कहूँ तो जो पत्रकारिता मैं करना चाह रहा था वो कर नहीं पा रहा था। अपने करियर की शुरुआत की बात बताऊं तो तब का काम काफी संतोषजनक नहीं था। दूसरों के लिखे हुए की भाषा ठीक करना, आर्टिकल्स के हेडलाइन लिखना वगैरह करता था शुरू शुरू में तो मुझे वो काफी खलता था। चूँकि मैं साहित्य का छात्र रहा हूँ और लिखने पढ़ने का अच्छा अनुभव था तो इन सब चीजों से दम घुटता था। तब से इतने सालों बाद मैंने पाया कि जहाँ से शुरू किया था मैं वापस वहीँ पहुँच गया हूँ। NDTV में आउटपुट एडिटर रहते हुए भी उसी तरह के काम थे जैसे कि रिपोर्टर की स्क्रिप्ट देखना, उसे एडिट करना, उसके लिए रनडाउन बनाना वगैरह वगैरह। तब मुझे इस बात की चिंता रहती थी कि मैं तो अपनी कहानियां नहीं ढूंढ पा रहा हूँ। जब इस बात को ले के मेरी बेचैनी बढ़ने लगती थी तो मैं कोई असाइनमेंट ले के  कहीं कोई स्टोरी करने चला जाता था। लेकिन ये भी तभी मुमकिन था जब मैं अपनी 8 घंटे की वो ड्यूटी पूरी कर लेता था। इसलिए ये रेगुलर करने की गुंजाईश नहीं थी। तो मुझे लगा कि इस क्षेत्र में मैं बन्ध रहा हूँ और अपने जीवन में जब भी मैंने खुद को किसी तरह से कैद पाया है तो उस से आज़ाद होने की मैंने पूरी कोशिश की है। दूसरी बात ये कि मेरा ये मानना रहा है कि अगर आज मैं पत्रकारिता छोड़ के सिनेमा में जा रहा हूँ तो पत्रकारिता का कोई नुकसान नहीं होगा और अगर कल को मैं सिनेमा छोड़ के किताब लिखने लग जाऊं तो सिनेमा का कोई नुक्सान नहीं होगा। क्योंकि कोई न कोई आ के उस जगह को भर देगा। काफी अच्छे और काबिल लोग हैं और आ रहे हैं हर क्षेत्र में।

मुम्बई का रुख करने पर क्या आपने निर्देशन और फिल्म मेकिंग की दिशा में बढ़ने से पहले इसकी कोई पारंपरिक शिक्षा या ट्रेनिंग ली?

अविनाश दास: मैं ऐसा करना चाहता तो था लेकिन मेरे पास वक़्त नहीं था। अपने जीवन में कोई भी मनचाहा काम मैं कायदे से नहीं कर पाया। पत्रकारिता में भी मास कॉम किये बिना ही उतर पड़ा था और उसी तरह मुझे लगा कि सिनेमा में भी मैं इसे देखते हुए, इसके बारे में बात करते हुए और समझते हुए इसे बनाना सिख लूंगा और ये विश्वास मेरे अंदर था। लेकिन बहुत काम लोगो को पता है कि मैंने कमल स्वरुप, जो कि एक जाने माने निर्देशक हैं, की डॉक्यूमेंट्री फिल्म “डांस फॉर डेमोक्रेसी” (जिसको सेंसर बोर्ड ने बैन कर दिया) का सारा रिसर्च किया था। हालाँकि ये एक डॉक्यूमेंट्री है लेकिन इसकी शूटिंग एक सिनेमा के स्तर पर हुई थी। बनारस में इसके शूट के लिए दो अलग अलग यूनिट थे तो उनमे से एक यूनिट खुद कमल स्वरुप और एक यूनिट मैं संभालता था।  तो उनके साथ रह कर मैंने काफी कुछ सीखा। उसके अलावा मैंने “गैंग्स ऑफ़ वासेपुर” की शूटिंग को भी काफी नज़दीक से देखा। हमारी वेबसाइट मोहल्ला लाइव उस फिल्म की मीडिया  पार्टनर भी रही। फिर मैंने चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म “मोहल्ला अस्सी”, जो अब तक रिलीज़ नहीं हो पायी है, उसके सेट पर भी काफी वक़्त बिताया। तो इस तरह से मैं सिनेमा बनाने का हुनर सीखता रहा। ट्रेनिंग का हर किसी का अपना एक तरीका होता है। कोई स्कूल जा के सीखता है तो कोई एकलव्य की तरह दूर से। तो मैंने सिनेमा बनाना एकलव्य की तरह से सीखा।

सिनेमा बनाने के मामले में क्या आप खुद को किसी से प्रेरित पाते हैं?

अविनाश दास: बहुत सारे लोगों से। मैं एक अच्छा खास सिनेमांची रहा हूँ और हर तरह की फ़िल्में देखी है।  चाहे वो पॉपुलर सिनेमा हो या पैरेलल सिनेमा हो , सबने मुझे प्रेरणा दी है। अपनी कहानी कहने के लिए मैंने हर जगह से खुद को प्रेरित पाया है।

इस कला क्षेत्र में आप किन उम्मीदों के साथ आएं हैं?

अविनाश दास: किसी के भी सिनेमा बनाने के पीछे अलग अलग वजहें होती है। या तो आप इस लिए फिल्म बनाना चाहते हो कि इस क्षेत्र में ग्लैमर है या फिर आप इसके जरिये अपने भीतर की कहानियां लोगो तक पहुँचाना चाहते हैं। मैं जब खुद सोचता हूँ कि मैं क्यों सिनेमा बनाना चाहता हूँ तो मुझे लगता है कि मेरे भीतर कुछ कहानियां ऐसी हैं जो मेरे दिमाग में घूमती रहती हैं और मैं उन्हें कहना चाहता हूँ। वो भी बहुत ही आक्रमक और काफी प्रभावशाली ढंग से और इसे बहुत सारे लोगों तक पहुँचाना चाहता हूँ। मैं अपनी कहानियों को कहने के लिए सिनेमा बना रहा हूँ और मेरे पास अभी बेशुमार कहानियां हैं। तो मुझे लगता है कि ये जो सफर शुरू हुआ है वो थोड़े दिन तो चलेगा, जब तक मेरे अंदर का ये उत्साह बना रहेगा।

आपके इस फैसले में घर वालों का कैसा सपोर्ट मिला ? इनके अलावा और कौन लोग थे जिन्होंने आपका हौसला बढ़ाया?

अविनाश दास: मैं शुरू से ही एक बड़ा इंडिपेंडेंट किस्म का इंसान रहा हूँ। जब से मैंने कमाना शुरू किया है तो घर वालों के साथ ही रहा हूँ और मेरे करियर के चुनावों की वजह से घरवालों को कोई आर्थिक कष्ट नहीं पहुंचा है तो मेरे फैसलों पर कोई ज़्यादा असर नहीं रहा उनका। लेकिन मेरी जब शादी हुई तो एक बड़ी जिम्मेदारी आयी मेरे ऊपर। मेरी एक बेटी भी है तो उसकी भी और जिम्मेदारी आयी। और जब सब कुछ जीवन में established था तो नेरी बीवी ने मेरी बेचैनी देखी और सिनेमा की तरफ मेरे रुझान को समझा। तो उसने मुझे कुछ वक़्त दिया और मुझसे जा के अपने इस रुझान की तरफ बढ़ने के लिए कहा। और उसने मुझे जो वक़्त दिया था उसके अंदर ही मैंने ये कर दिया। इसके अलावा कई लोगों ने मुझे प्रोत्साहन दिया। अनुराग कश्यप ने एक स्पेस दिया कि मैं फिल्म से जुड़े लोगों के साथ उठ बैठ सकूँ, उनसे सीख सकूँ। चंद्रप्रकाश द्विवेदी, अश्विनी चौधरी, सुभाष कपूर, अनुभव सिन्हा, मनोज बाजपेयी जो कि मेरे बड़े भाई समान हैं इन सारे लोगों ने सिनेमा के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए मुझे बहुत प्रोत्साहित किया।

सवाल-जवाब का रुख अब आपकी आनेवाली पहली फिल्म “अनारकली ऑफ़ आरा” की तरफ करते हैं

“अनारकली ऑफ़ आरावली” के बारे में बताएं। ये फिल्म बनाने का ख्याल कहाँ से आया?

अविनाश दास: अनारकली आॅफ आरा एक गाने वाली लड़की की कहानी है। समाज के तथाकथित फूहड़ पायदान पर दिखने वाली एक स्त्री के स्वाभिमान की कहानी है जो अपनी अस्मिता बचाने के लिए बड़ी ताकतों से अपने दम पर लड़ती है। 2006 या ’07 में मैंने यूट्यूब पर ताराबानो फ़ैज़ाबादी का एक गाना सुना था – हरे हरे नेबुआ कसम से गोल गोल। इस म्यूज़िक वीडियो में कुछ सेकेंड के लिए ताराबानो का फुटेज़ है। उसमें उनके चेहरे के सपाट भाव ने मुझे एक स्ट्रीट सिंगर की कहानी कहने के लिए प्रेरित किया।

फिल्म के लिए आरा का चयन क्यों? क्या यह फिल्म पुरी तरह से आरा में रहकर बनी है?

अविनाश दास: आरा से मेरी अच्छी वाक़फियत रही है। मैं यूपी के एक सिंगर से इंस्पायर्ड हुआ था – लेकिन चूंकि यूपी की ज़बान पर मेरी पकड़ नहीं थी – इसलिए मैंने बिहार के इस शहर का चयन किया। यह एक बहुत सही फ़ैसला था। हम आरा में ही ये फिल्म शूट करना चाहते थे – लेकिन कुछ संसाधनगत वजहों से हमें दिल्ली से सौ किलोमीटर दूर अमरोहा में आरा का सेट बनाना पड़ा।

कलाकारों के चयन की प्रक्रिया क्‍या रही? स्वरा भास्कर को मुख्य किरदार में लेने की वजह क्या रही?

अविनाश दास: हमारी फिल्म के कास्टिंग डायरेक्टर हैं जीतेन्द्र नाथ जीतू हम एक दूसरे को पिछले बीस-बाइस सालों से जानते हैं। इस फिल्म में उन्होंने मुझे एसिस्ट भी किया है। वह मेरे मिज़ाज से और उससे भी ज़्यादा बिहार से परिचित हैं। तो जीतू ने अनारकली आॅफ आरा के लिए बड़े अतरंगी और रीयल किरदार चुने। इस फिल्म में बिहार के नब्बे फीसदी कलाकार हैं। आरा के भी कई लोग शामिल हैं इसमें। स्वरा को इसलिए लिया क्योंकि स्वरा के अलावा इस किरदार को कोई और कर ही नहीं सकता था।

फिल्‍म के संगीत के बारे में संक्षेप में बताएं?

अविनाश दास: मैं इस मामले में सौभाग्यशाली हूं कि मुझे रोहित शर्मा जैसे संगीतकार मिले। वो विचारों की आवाजाही के मामले में जितने खुले हैं – उसने इस फिल्म के संगीत को एक अलग ही ऊंचाई दी है। फिल्म के मर्म को सामने में लाने में उनके संगीत की अहम भूमिका है। जाहिर है कि अनारकली आॅफ आरा गाने वाली लड़की की कहानी है – तो फिल्म म्यूज़िकल है। हमारे म्यूज़िक डाइरेक्टर ने फिल्म का संगीत रचते हुए लोक यानी फोक की ज़मीन नहीं छोड़ी। हमारी फिल्म का संगीत आपको एक नयी दुनिया में ले जाएगा।

इस फिल्म के लिए प्रोड्यूसर और डिस्ट्रीब्यूटर कैसे मिले? आपके प्रोड्यूसर के बारे में बताएं ?

अविनाश दास: इस मामले में मैं ख़ुशकिस्मत हूं कि मुझे संदीप कपूर जैसे प्रोड्यूसर मिले। उन्होंने सबसे पहले कहानी पर भरोसा किया और उसके बाद एक अच्छी टीम बनाने में उन्होंने मदद की। वे ख़ुद स्टारडम से ज़्यादा टैलेंट पर भरोसा करते हैं, इसलिए उन्होंने मुझे फिल्म में एक्टर लेने के लिए प्रोत्साहित किया था – स्टार नहीं। हमारे प्रोड्यूसर ने कभी हमें ये नहीं कहा कि इसे छोटी फिल्म की तरह ट्रीट करो। उन्होंने किसी भी सामान्य मुख्यधारा की फिल्म की तरह हमें सारी सुविधाएं दीं। शूट के बाद आठ महीने तक के लिए हमारे पास एडिट रूम रहा। संदीप कुमार एक बेहतरीन और संवेदनशील इंसान हैं। उनके भीतर एक बच्चा हमेशा मौजूद रहता है, जो कुछ मामलों में ज़िद्दी भी होता है। लेकिन अंतत: उनका हर क़दम फिल्म के हक़ में ही होता है। फिल्म बनने के दौरान हमारी असहमतियां भी रही हैं, बहुत बुरे झगड़े भी रहे हैं – लेकिन वे कभी इन असहमतियों को व्यक्तिगत तौर पर नहीं लेते। यह उनकी सबसे बड़ी ख़ासियत है।

आपने किस उम्र में तय किए कि आपको सिनेमा करना है? क्या-क्या त्याग करना पड़ा?

अविनाश दास: सिनेमा करने की बात बचपन से थी – लेकिन जीवन की परिस्थितियों के चलते मैं कुछ और कर रहा था। लेकिन जब चार-पांच साल पहले यह अंतिम तौर पर तय किया – तो ज़ाहिर है परिवार से दूर मुंबई आना पड़ा। मेरी पत्नी मुक्ता ने कहा – जा सिमरन, जी ले अपनी ज़िंदगी। सुर और हम दोनों एक दूसरे को बहुत मिस करते रहे। लेकिन अब दो-तीन महीनों में हम साथ साथ रहने जा रहे हैं।
हर तरह की यात्रा एक संघर्ष ही होती है। फिल्म बनाने के बारे सोचना और फिल्म बनाने की कोशिश करना और फिल्म बना लेना – यह एक प्रक्रिया है, यात्रा है। और कोई संसार बना बनाया नहीं होता। यह संसार भी। इसे भी एक दिन छोड़ कर जाना होता है। तो मुझे लगता है आदमी को विदेह होना चाहिए। मैं कुछ हद तक विदेह हूं।

एक पत्रकार होने के नाते आप सिनेमा को कला का माध्यम मानते हैं या फिर जागरूकता या कोई सन्देश देने का माध्यम?

अविनाश दास: कोई भी कला अपनी बात ही कहती है। उसमें से समाज अपने लिए खुराक चुन ले तो चुन ले। सिनेमा या किसी भी कला माध्यम को इस तरह से देखने की कोशिश से बचना चाहिए।

अविनाश दस का इस इंटरव्यू के लिए इतना वक़्त निकलने और इतनी तफ्तीश से बातचीत करने के लिए बहुत धन्यवाद और उनकी आनेवाली फिल्म के लिए हम सब की तरफ से शुभकामनायें। “अनारकली ऑफ़ आरा” 24 मार्च को रिलीज़ होनेवाली है

अनारकली ऑफ़ आरा का ट्रेलर :

अनारकली ऑफ़ आरा के गाने यहाँ सुनें :

तस्वीरें: फेसबुक (साभार)

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Quote of the day:“Life isn't about finding yourself. Life is about creating yourself.” 
― George Bernard Shaw

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