मैं कहीं भी रहूं, मेरी जड़े बिहार में ही हैं – अनु सिंह चौधरी

अमेजन पर कोई किताब ढूंढते ढूंढते एक किताब पर नजर पड़ी “नीला स्कार्फ”। जिज्ञासा जागी की एक स्कार्फ पर पूरी किताब में क्या लिखा होगा किसी ने। लेखिका का नाम था “अनु सिंह चौधरी”। किताब आर्डर कर दी,पढने पर बिहार की खुशबू थी किताब में। मुझसे रहा नही गया, तुरंत नाम गूगल किया, जानकारी तो मिली पर पता नहीं लग पाया की कहाँ से हैं। अभी किताब पूरी भी नहीं हुई थी की एक ईमेल लिख डाला। जवाब भी तुरंत आया, पता चला बिहार से हैं। फिर तो इमेल्स का सिलसिला चल पड़ा। तो आइये आपको भी मिलाते  हैं इस बहुमुखी प्रतिभा की धनी बिहारन से।

अनु सिंह चौधरी सिर्फ एक लेखिका ही नहीं एक अनुवादक और फिल्ममेकर भी है। अनु  रेडियो, टीवी, फिल्म और न्यूज मीडिया के लिए लिख चुकी हैं और साथ ही पुरस्कार प्राप्त डाक्यूमेंट्री और वेब सीरीज का लेखन और निर्देशन कर चुकी हैं। उनकी किताब “नील स्कार्फ” एक कथा संग्रह है और उनकी दूसरी किताब “मम्मा की डायरी” हर कामकाजी माँ और नयी माँ के लिए एक मस्ट रीड किताब है। उनकी बनाई वेब सीरीज The good girl show” का रूपांतरण पुरस्कार प्राप्त नाटक Antardwand: the conflict within” में किया गया था और अब उसे एक उपन्यास की शक्ल दी जा रही है। इतना ही नहीं, अनु बीस से भी अधिक अंग्रेजी किताबों का हिंदी अनुवाद भी कर चुकी हैं। अनु अपने ब्लॉग mainghumantu.blogspot,com पर लिखती हैं।

उनसे ईमेल में हुई बातचीत के अंश प्रस्तुत है:

मैं: आपने लिखना कब और कैसे शुरू किया? अपनी शिक्षा दीक्षा और कैरियर की शुरुआत के बारे में बताएं।

 

अनु सिंह चौधरी: ठीक-ठीक याद नहीं कि लिखना कब शुरू किया था। कच्ची-पक्की कविताएँ तो बचपन में ही आकाशवाणी के साप्ताहिक बाल कार्यक्रम में सुनाने लगी थी। लेकिन लिखना कैरियर बन जाएगा, ऐसा कभी नहीं सोचा था। कॉलेज में साहित्य की पढ़ाई की, फिर पत्रकारिता करने के बाद एनडीटीवी इंडिया के साथ काम करने लगी। नौकरी स्क्रिप्टलेखन के दम पर ही मिली थी। लेकिन तब भी लिखने को कैरियर नहीं मानती थी। छोटी सी उम्र से फ़्रीलांस राइटिंग करती रही, तब भी लिखने को कैरियर नहीं माना। दरअसल, लिखना कैरियर भी हो सकता है, ये बात हम जल्दी स्वीकार करना नहीं चाहते। अब सोशल मीडिया के इस दौर में सब राईटर हैं, और कोई भी राईटर नहीं। मैंने उस दिन लेखन को अपना कैरियर माना जिस दिन ये अहसास हुआ कि मैं दिन के आठ से दस घंटे लिखने, या लिखने की कोशिश करने में बिताती हूँ – कम से कम सप्ताह में पाँच दिन ज़रूर लिखती हूँ, और लिखने से ही मेरी ख़ुशी है, पहचान है, रोज़ी-रोटी है, शौक़ पूरे करने के ज़रिए हैं। उस लिहाज से एक लेखक के रूप में मेरा कैरियर मुश्किल से चार-पाँच साल पुराना है। उसके पहले मैं टीवी प्रोडक्शन, फ़िल्म प्रोडक्शन, कम्युनिकेशन्स, फ़िल्ममेकिंग, अनुवाद, एडिटिंग और वीडियो ट्रेनिंग जैसी कई और चीज़ें कर चुकी हैं।

मैं:आप रेडियो, टीवी, फिल्म, न्यूज के लिए लिखती हैं और आपने दो किताबें भी लिखी हैं। इसमें से क्या लिखना सबसे ज्यादा पसंद है।

 

अनु सिंह चौधरी: ये तय कर पाना बड़ा मुश्किल है कि किस माध्यम में लिखना ज़्यादा पसंद हैं। सभी विधाओं के अपने फ़ायदे हैं, और अपनी चुनौतियाँ हैं। रेडियो के माध्यम से आपका लिखा हुआ दस करोड़ से ज़्यादा श्रोताओं तक पहुँचता है। टीवी आपको ऐसे किरदार रचने के अवसर देता है जो हर रोज़ दर्शकों के घर तक पहुँचते हैं, उनके दुख-सुख में शामिल होते हैं। टीवी को राईटर का माध्यम कहा भी जाता है। फ़िल्मों के लिए लिख पाना हर नए लेखक की चाहत होती है। लेकिन फ़िल्म लेखक का नहीं, बल्कि निर्देशक का माध्यम है। न्यूज़ का अपना मज़ा है। अलग किस्म का थ्रिल है। किताबें वो दुनिया है जो आप अपने शब्दों, अपने किरदारों के ज़रिए रचते हैं। इसलिए किताबें आपकी बेहद निजी दुनिया भी है, जिसमें पाठक से आपका रिश्ता और माध्यमों की अपेक्षा अधिक अंतरंग होता है। अब आप तय कीजिए कि मुझे किस विधा में लिखना सबसे ज़्यादा पसंद होना चाहिए।

 

मैं: मम्मा की डायरी में आपने अपने बच्चो के जन्म से पहले और जन्म के बाद के कुछ सालों के बारे में लिखा है, बढ़ते हुए बच्चों या बड़े हो चुके बच्चों के साथ जुड़े अनुभव लिखने का इरादा है।

 

अनु सिंह चौधरी: है तो, लेकिन अब किसी और तरीके से। डायरी होगी या संस्मरण, या फ़िल्म ही सही – अभी तय नहीं किया। जब सही वक़्त आएगा, और निजी अनुभवों को साझा करने के लिए मैं भी तैयार रहूँगी और मेरे बच्चे भी, तब कोई न कोई ज़रिया भी निकल आएगा।

 

मैं: मुझे इंतज़ार रहेगा। पोस्ट पार्टम डिप्रेशन को आमतौर पर नयी माँ का भावनात्मक या हार्मोनल असंतुलन करार दिया जाता है। इस से जूझती महिलाओं को आप क्या संदेश देना चाहेंगी।

अनु सिंह चौधरी: सब्र रखिए। दिस टू शैल पास। ये वक़्त भी गुज़र जाएगा। मदरहुड आपको और काबिल और हौसलामंद बनाता है। माँ बनकर आप वक़्त की कीमत ज़्यादा बेहतर समझ पाती हैं – अपनी भी और दूसरों की भी।

 

मैं: आप अपने आपको एक मां के रूप में कितना सफल पाती हैं।

अनु सिंह चौधरी:ये सवाल आपको मेरे बच्चों से पूछना चाहिए।

 

मैं: आप अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि किसे मानती हैं?

अनु सिंह चौधरी: अपने बच्चों को। और अपने परिवार को।

 

मैं: नीला स्कार्फ की आपकी कहानियों में बिहार की झलक दिख जाती है। बिहार से दूर रह कर भी ऐसा क्या है जो आपको अपनी जड़ों से जोड़े रखता है।

अनु सिंह चौधरी: मैं दूर हुई हूँ बिहार से। मेरी जड़ें मुझसे दूर नहीं हूँ। मैं चाहे जहाँ रहूँ, घर मेरा वहीं हैं अभी भी। मेरा मायका सिवान ज़िले में है और ससुराल पूर्णिया में। तो ज़ाहिर है, अपने लेखन से मैं अपनी जड़ों को कभी जुदा कर ही नहीं पाऊँगी।

 

मैं: चूंकि आप घुमंतू भी हैं तो आप ये  अच्छे से बता सकती हैं कि बिहार की महिलाओं और दूसरे राज्यों की महिलाओं में और मांओ में क्या फर्क है।

अनु सिंह चौधरी: फ़र्क़ कई हैं, लेकिन समानताएँ भी उतनी ही हैं। पेरेन्टिंग को लेकर दुविधाएँ वही हैं। कामकाजी महिलाओं की चुनौतियाँ वही हैं – चाहे वो एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की हो, या फिर किसी आईएएस ऑफ़िसर की, खेत में जाती मजदूर औरत की हो या बारह-चौदह घंटे की कॉरपोरेट नौकरी करने को मजबूर एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की। ज़िन्दगी किसी के लिए आसान नहीं, एक माँ पर ख़ैर अपने जीवन के अलावा दो-चार और ज़िन्दगियों का दारोमदार भी होता है। ऐसे में छोटे-छोटे परिवारों में विघटित होते समाज – चाहे वो अहमदाबाद के हों या अगरतल्ला में – एक माँ को और तन्हां ही बनाते हैं। ऐसे में एक ही चीज़ है जो एक माँ को, एक पेरेन्ट को, एक परिवार को चाहिए – एक-दूसरे को समझने के लिए सहृदयता। एक माँ को दूसरी माँ से जुदा, एक परिवार को दूसरे परिवार से जुदा भाषा, भूगोल, रहन-सहन या संस्कृति नहीं बल्कि आचार-व्यवहार बनाते हैं।

अनु की दोनों किताबें “नील स्कार्फ” और “मम्मा की डायरी” Amazon पर उपलब्ध हैं अनु इसी तरह सफलता की नयी उचाइयां छूती रहें हम यही कामना करते हैं.

“जो साथ है, उसके बिछड़ जाने का डर और जो बिछड़ गया उसके लौट आने की उम्मीद-शादियाँ इसी भरोसे पर चलती रहती हैं”- नीला स्कार्फ

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Quote of the day:“You live it forward, but understand it backward.” 
― Abraham Verghese, Cutting for Stone

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