भोजपुरी ही मेरी भाषा है – अमित मिसिर, डायरेक्टर ललका गुलाब

 इनसे मिलिए ! ये हैं अमित मिसिर, ठेठ भोजपुरिया. हों भी क्यों ना? आखिर डुमरांव के जो ठहरे. डुमरांव वैसा बिलकुल नहीं है जो श्रीमान चेतन भगत अपनी किताब और फिल्म में दिखाते हैं. और न ही भोजपुरी वैसी है जो अपनी आगामी फिल्म में बोनी कपूर के सुपुत्र दिखाना चाह रहे हैं. भोजपुरी सुने के बा, तब अमित जी से बात करे के पड़ी आ सिनेमा “ललका गुलाब” देख के लोर टपकावे के पड़ी.
हमारी मुलाकात एक बार “ललका गुलाब” के नायक अभिषेक शर्मा जी(जो पेशे से आर्किटेक्ट हैं) के ऑफिस में हुई थी. अमित जी का मुरेठा देख कर और उनके मुंह से भोजपुरी सुन कर दिल गदगद हो गया था. आज के जमाने में युवा अगर भोजपुरी में बोलता है तो सामान्यतः पटना में उसे लठैत होने की दृष्टि से देखा जाता है.
काफी समय से बिहार से बाहर हूँ तो जब कोई बिहारीपन को शान से दिखाता है तो बड़ी ख़ुशी मिलती है. उनके जाने के बाद पता लगा कि वो एक फिल्म डायरेक्टर हैं जिसमें अभिषेक जी मुख्य किरदार निभा रहे हैं.
तीन साल तक असिस्टेंट रहने के बाद अमित जी ने पहली अपनी लघु फिल्म “अंडर द रॉक” बनाई थी जो बच्चों में लग रही नशे की लत पर आधारित थी. इस फिल्म की पटकथा भी स्वयं अमित ने ही लिखी थी. यह फिल्म इंग्लैंड के फिश आई फिल्म फेस्टिवल में चयनित हुई थी और साथ ही मियामी फिल्म फेस्टिवल और एमर्जिंग लेंस कल्चरल फिल्म फेस्टिवल में सेमीफाइनलिस्ट भी थी. “ललका गुलाब” भी मुंबई के अथर्व फिल्म फेस्टिवल २०१७ में चयनित हुई, लॉस एंजेल्स के बिग शॉटस अंतराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल और कनाडा के इमर्जिंग लेंस कल्चरल फिल्म फेस्टिवल में सेमी फाइनलिस्ट रही. भोजपुरी सिनेमा को नए आयाम दिलाने की उनकी मुहीम जारी है. इनका कहना है कि भोजपुरी को एक व्यापक भाषा बनाने के मकसद से ये फिल्म निर्माण में उतरे हैं और इनकी फिल्म “ललका गुलाब” से साबित हो चुका है कि भोजपुरी एक सहज भाषा है और लोगों ने इसकी भावना को समझने में भाषा को बाधा नहीं माना है.
हाल ही हुई उनसे बातचीत के कुछ अंश पेश हैं.

अपनी शुरूआती जीवन के बारे में कुछ बताएं.


अमित मिसिर जी: मेरा जन्म डुमराँव में हुआ और प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा भी वहीं हुई. मैं बचपन से पढने में अच्छा था इसलिए मुझे इंजिनियर बनाने का निर्णय लिया गया. इसके बाद मैं जयपुर में आइआइआरएम कालेज से इंजीनियरिंग पढने चला गया. वहां जाकर पता चला कि “बिहारी” शब्द को बाहर की दुनिया में एक गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है. मैं बहुत आहत हुआ. उसी वक़्त मेरे मन में यह भावना आई कि अपने बिहार की छवि को बदलने के लिए कुछ न कुछ करना है.

आपको “ललका गुलाब बनाने की प्रेरणा कहाँ से मिली? क्या इसकी पटकथा का आपके वास्तविक जीवन से कोई सम्बन्ध है?


अमित मिसिर: जैसा कि मैंने आपको पहले बताया कि जब पहली बार डुमरांव से बाहर निकला तो पता लगा कि मुझे बिहारी इस लिए नहीं बोला जाता था क्यूंकि मैं बिहार से हूँ बल्कि “बिहारी” शब्द को गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है. मैंने तभी ठान लिया था कि इसके लिए कुछ करूँगा. इसके लिए केवल दो ही रास्ते थे – या तो मैं राजनीती में जाऊं या फिर फिल्मों में और राजनीती में मैं नहीं जा सकता क्यूंकि मुझे गुस्सा बहुत जल्दी आ जाता है(हँसते हुए). फिल्मों से बचपन से बहुत प्यार था इसलिए फिल्म को चुना. परिवार का पूरा सहयोग था इसलिए मैं फिल्म निर्माण में उतर गया. इसकी कहानी का मेरे जीवन से कोई लेना देना नहीं है पर अश्विनी रूद्र जी के जीवन में कुछ ऐसा ही हुआ था. उन्होंने ये कहानी लिखने के पांच साल बाद जब मुझे सुनाई तो मुझे लगा यही वो फिल्म है जो मैं बनाना चाहता हूँ.

आपकी उम्र में आमतौर पर लोग नायक बनने का सोचते हैं पर आपने डायरेक्टर बनने का क्यूँ सोचा ?


अमित मिसिर: इसकी बस एक ही वजह थी कि मैं कहानी कहना चाहता था. मैं जो दिखाना चाहता था उसके लिए मुझे कहानी पर पूरा नियंत्रण चाहिए था और ऐसा सिर्फ निर्देशक बन कर ही संभव था.

ललका गुलाब में आपका सबसे पसंदीदा किरदार कौन सा है?


अमित मिसिर: इस कहानी में आपने गौर किया होगा कि दादी का रोल बेहद सीमित है पर दादी कहानी में हर जगह है. दादाजी हर पल उनको महसूस करते हैं और इसकी वजह उनका प्रेम था जो उनके मरने बाद भी उनको दादाजी और उनके पोते के बीच जीवित रखे था. मैं दादी के किरदार से काफी जुड़ाव महसूस करता हूँ.

इस लघु फिल्म को भोजपुरी में बनाने के पीछे कोई ख़ास वजह? फिल्म इंडस्ट्री में भोजपुरी का अस्तित्व विलुप्त होता जा रहा है. फिल्मो में भोजपुरी को गुंडों की भाषा के रूप में दिखाया जाता है. इसपर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

अमित मिसिर: यह सच है भोजपुरी भाषा को तत्कालीन फिल्मों में स्टीरियोटाइप की तरह दिखाया जाता है पर असल में वो भोजपुरी नहीं है. उसे बनाने वाले भोजपुरी वास्तव में भोजपुरी भाषी नहीं होते हैं भोजपुरी भाषा की विविधता को आजतक फिल्मों से दूर रखा गया है. मेरी फिल्म से उनलोगों ने भी जुडाव महसूस किया है जो न भोजपुरी जानते हैं न भोजपुरी बोलते हैं. विदेशों में भी इसे देखा गया है. और यही मेरा मकसद है कि भोजपुरी को एक व्यापक भाषा के रूप में स्थापित कर सकूँ. इस फिल्म में भी हमने एक खुलापन दिखाया है जिसमें एक दादा खुल कर अपने पोते से कहते हैं कि वो उसकी दादी से कितना प्यार करते हैं.


तत्कालीन समय में भोजपुरी सिनेमा को आप कहाँ पाते हैं?


अमित मिसिर: भोजपुरी सिनेमा हाशिये से बहुत नीचे है. भोजपुरी सिनेमा में कुछ भी ऐसा नहीं है जिस से हम लोगों को प्रभावित कर सकें और यहीं वजह है कि भोजपुरी और भोजपुरी सिनेमा की छवि ख़राब हो चुकी है.


ललका गुलाब के द्वारा आप लोगों को क्या सन्देश देना चाहते हैं?


अमित मिसिर: मेरा सन्देश यहीं है कि भोजपुरी बहुत समृद्ध भाषा है और इस भाषा में बहुत मिठास है. भोजपुरी विविधता को लोगों ने आज तक नहीं पहचाना है. मैं इस भाषा की ताकत और पारिवारिक मूल्यों को अपनी फिल्म में दिखाना चाहता था और मैं ऐसा करने में सफल रहा हूँ 

भविष्य की अपनी योजना के बारे में बताएं.

अमित मिसिर: मैं अगले ३-४ सालों तक केवल लघु फिल्में बनाने वाला हूँ और फ़िलहाल मेरे पास ६ कहानियां हैं. मेरी अगली फिल्म का नाम “दफा ३०२” है . भोजपुरी मेरा पहला प्यार है इसलिए मैं फिलहाल भोजपुरी में ही फिल्में बनाने वाला हूँ.

हम अमित जी को उनकी आगामी फिल्मों के लिए शुभकामना देते हैं और उम्मीद करते हैं कि वो भोजपुरी सिनेमा की तस्वीर बदलने में सफल रहेंगे. उनकी फिल्म “ललका गुलाब” आप यहाँ देख सकते हैं.

Quote of the day:“It is better to be hated for what you are than to be loved for what you are not.” 
― André Gide, Autumn Leaves

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