जानिये कुछ बातें तीज के बारे में।

४ सितम्बर को बिहार में तीज मनायी जाएगी। इसे हरितालिका तीज भी कहते हैं। छतीसगढ़ में इसे तीजा कहते हैं और नेपाली तथा हिंदी में तीज। देश के कुछ हिस्सों में कजली तीज और हरयाली तीज भी मनाई जाती है. नाम चाहे जो भी हो इस त्यौहार का उद्देश्य सिर्फ एक होता है, अखंड सौभाग्य की कामना. कुंवारी लड़कियां मन मुताबिक वर पाने के लिए भी ये व्रत रखती हैं.

तीज माने तीन, मतलब यह की तीज भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हस्त नक्षत्र के दिन मनाया जाता है। इस दिन कुमारी और सौभाग्यवती स्त्रियाँ गौरी-शंकर की पूजा करती हैं तथा कठिन निर्जल व्रत रखती हैं। तीज से एक दिन पहले नहा खा भी होती है । इस व्रत को करवाचौथ के समकक्ष माना जा सकता है पर इसकी अवधि तकरीबन दुगुनी होती है, व्रत अगले दिन पूजा के बाद ही तोडा जाता है। फिर भी महिलाओं का उल्लास कम नहीं होता। व्रती सुहागनें जब सोलह श्रृंगार करती हैं तो उनके चेहरे की चमक देखने लायक होती है।

इस व्रत से जुड़ी एक मान्यता यह है कि इस व्रत को करने वाली स्त्रियां पार्वती जी के समान ही सुखपूर्वक पतिरमण करके शिवलोक को जाती हैं। सर्वप्रथम इस व्रत को माता पार्वती ने भगवान शिव शंकर के लिए रखा था। लेकिन हरितालिका अर्थ कुछ और ही है। हरितालिका शब्द “हरित “ और “आलिका” के समागम से बना है। यहाँ हरित का अर्थ अपहृत है और आलिका का अर्थ सहेली है। इसके बारे में मान्यता यह है की माँ पारवती ने “शैलपुत्री” के रूप में अवतार लिया था। नारद जी के कहने पर उनके पिता हिमालय ने उनका हाथ विवाह में भगवान विष्णु को देने का वचन दिया था। माँ पार्वती को जब अपने पिता के इस निर्णय का पता चला तो उन्होंने यह बात अपनी एक सहेली को बताई। उनका तो जन्म ही भगवान शिव के लिए हुआ था , इसलिए उनकी सहेली उन्हें घने जंगल में ले गयी ताकि उनके पिता उनका विवाह भगवान विष्णु से न कर सकें।


भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को माँ पारवती ने अपने केश से शिव लिंग बना कर उसकी पूजा की. इस पूजा से प्रसन्न होकर भगवान् शिव पार्वती माता से विवाह करने को तैयार हो गये। इसी उपलक्ष्य में सुहागिने और कुंवारी कन्याएं शिव पार्वती का पूजन और व्रत करती है। भूख प्यास को भूल कर रात भर वो शिव और पारवती के विवाह का उत्सव मनाती हैं। तीज व्रती के लिए सोना निषेध है। कहा जाता है तीज व्रती अगर इस दिन सो जाये तो अगले जन्म में उसे मगरमच्छ की योनि में जन्म मिलता है .
हरितालिका तीज बिहार, उत्तराखंड ,राजस्थान ,उत्तर प्रदेश एवं झारखण्ड में मनाया जाता है। पंजाब में तीज को तीजय कहते हैं और वर्षा के आने के उल्लास मनाया जाता है। हरियाली तीज सावन में मनायी जाती। इसमें महिलाएं और लड़कियां हरे रंग से श्रृंगार करती हैं और मेहंदी लगती है. वर्षा से हरा भरा वातावरण इस त्यौहार का सूचक है। महिलाएं झूला झूल कर उत्सव मनाती हैं। देश के पूर्वी इलाकों में इसे कजली तीज के रुप में जाना जाता है.
नाम चाहे जो भी हो हर त्यौहार का उद्देश्य प्रसन्नता है, मौसम और श्रृंगार दोनों मिल कर तीज मनाते हैं। स्त्रियाँ श्रृंगार से शोभायमान होती हैं तो धरती मौसम के रंग में रंग कर खिल उठती है. हमारे देश में त्योहारों की विविधता इतनी है की जीवन एक उत्सव बन जाता है. सब दुर्भावों को भूल कर हर त्यौहार को ख़ुशी ख़ुशी मनाएं और प्रसन्न रहे।

हरितालिका तीज की अग्रिम शुभकामना 🙂

 

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