अगर आप भी बिहार से दूर रहते हैं तो ये मैथिली गीत आपके लिए है

अपने प्रदेश की भाषा की बात ही कुछ और होती है। मिथिलांचल के करीब होने के कारण मैथिली भाषा की मिठास से भली भांति अवगत हूँ। अब इस मिठास में मधुर संगीत और हरिहरन जी की आवाज़ मिल जाये तो क्या बात हो? “आइब गेलियौ परदेस गे मै रहबौ कोनाक तोरा बिन”। ये गाना सुनेंगे तो आपको इन तीनो मीठी चीज़ों का समागम मिलेगा। ये गाना किसी मैथिली गायक ने नहीं बल्कि पद्म श्री हरिहरन जी ने गाया है। कानों को सुकून देता ये गाना, 2016  में  राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित मैथिली फिल्म “मिथिला मखान” का है जो हाल ही में यूट्यूब चैनल बेजोड़ पर रिलीज़ हुआ है।

यह गीत एक ऐसे बेटे के दिल की आवाज़ है जो परदेश में जाकर अपनी माँ को याद करता है। यह गीत हर अप्रवासी भारतीय के दर्द को आवाज़ देता हुआ प्रतीत होता है। अगर आप भी अपने घर परिवार से दूर हैं तो यह गीत जरुर आपके दिल के तार छेड़ देगा। इस गीत के खूबसूरत बोल विवेक रंजन ने लिखे हैं और निर्देशक नितिन नीरा चंद्रा हैं। संगीत आशुतोष सिंह ने दिया है और गाने के निर्माता नीतू चंद्रा, नितिन नीरा चंद्रा एवं कुंदन झा हैं। गाने को अभिनेता कांति प्रकाश झा पर फिल्माया गया है और उनकी माँ के किरदार में आप प्रेमलता मिश्र जी को देखेंगे। साथ साथ आप इसमें हरिहरन जी को गाते हुए भी देख सकेंगे। मैथिली सिनेमा एवं मैथिली संगीत को जन जन तक पहुंचाने का चम्पारण टाकीज का ये प्रयास सराहनीय है।

अब आपको कुछ बातें फिल्म “मिथिला मखान” के बारे में भी बता देते हैं। 2016 में “बेस्ट मैथिली फिल्म” का राष्ट्रीय  पुरस्कार पाने के बाद  यह फिल्म किसी कारणवश अभी तक थिएटर में रिलीज़ नहीं हो सकी है। यह एक बड़े बजट की फिल्म है जिसकी शूटिंग यूएस और कनाडा में भी हुई थी। यह फिल्म एक ऐसे युवक की कहानी है जो अपने दादा की बंद हो चुकी कंपनी “मिथिला मखान प्राइवेट लिमिटेड” को फिर से शुरू करने की कोशिश करता है। उद्यमवृत्ति को बढ़ावा देने के साथ साथ इस फिल्म में अपने घर परिवार से दूर रहने के दर्द को भी दर्शाया गया है। हम आशा करते हैं की यह फिल्म शीघ्र ही सिनेमाघरों में देखने को मिले और चंपारण टाकीज को इस खूबसूरत गीत के लिए बहुत बहुत बधाई देते हैं। गाने का वीडियो आप यहाँ क्लिक कर के  देख सकते हैं। तो अभी ये गाना देखिये और अपनी माँ, और घर की यादों में खो जाइये।

Lyrics: Vivek Ranjan

आयब गेलियौ, परदेस गे मै

रहबौ कोनाक तोरा बिन

रहबौ कोनाक तोरा बिन

छुइट गेलौ सब टा दुआरि दलान गे
हाट के कचरी मुरही मखान गे
हाट के कचरी मुरही मखान गे

पोखर , पावन, तुलसी, सिरागू
केयो नय कहय गे, बउआ भोरे जागू
केयो नय कहय गे, बउआ भोरे जागू

लोर कऽ पोछि-पोछि
तोरे लऽ सोचि-सोचि
ताकी जीवनक उद्देस गे मै

रहबौ कोना कऽ तोरा बिन
रहबौ कोना कऽ तोरा बिन

आलाप

चंदा पोछय आँचर से लोर गे
तमसा कऽ बइसल दउगा (कोना) में भोर गे
तमसा कऽ बइसल दउगा (कोना) में भोर गे

बाध (वीराना) नऽ गाछी, अनहद शोर गे
रूसल रउदा(धूप) कानय छौ ज़ोर से
रूसल रउदा(धूप) कानय छौ ज़ोर से

लोर कऽ पोछि-पोछि तोरे लऽ सोचि-सोचि सोहे नऽ यै हमरा ई देस गे….मै (माँ ) रहबौ कोना कऽ तोरा बिन रहबौ कोना कऽ तोरा बिन आयब गेलियौ, परदेस गे मै रहबौ कोना कऽ तोरा बिन हो….रहबौ कोना कऽ तोरा बिन रहबौ कोना कऽ तोरा बिन रहबौ कोना कऽ तोरा बिन

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Quote of the day: “Knowledge, like air, is vital to life. Like air, no one should be denied it.” 
― Alan Moore, V for Vendetta

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