“जबरिया जोड़ी दहेज की दिक्कत से लड़ती फिल्म है” : फिल्म के लेखक संजीव झा से खास बातचीत

बिहार के लोग देश-विदेश में अपनी मेहनत की बदौलत सफलता का परचम लहराते रहे हैं। चाहे वह सिनेमा हो, साहित्य, राजनीति या अन्य कोई भी क्षेत्र हो, बिहारी अपनी मौजूदगी दर्ज कराने को हमेशा तत्पर रहते हैं। बॉलीवुड की बात करें तो पंकज त्रिपाठी, मनोज बाजपेई, संजय मिश्रा जैसे सदाबहार अभिनेताओं के साथ साथ बिहार के कई लेखक, गीतकार, संगीतकार और निर्देशक यहां बिहार का नाम रौशन कर रहे हैं। इसी कड़ी में अगला नाम संजीव झा का है जो कि आने वाली बॉलीवुड फिल्म ‘जबरिया जोड़ी’ के लेखक हैं जो की बिहार की पृष्टभूमि पर बनी है। इस फ़िल्म में सिद्धार्थ मल्होत्रा और परिणिति चोपड़ा मुख्य भूमिका में हैं। इनके अलावा संजय मिश्रा का भी इस फ़िल्म में अहम किरदार है। बिहार से ताल्लुक रखने वाले गीतकार राजशेखर ने इस फिल्म के दो गाने लिखे हैं। पटनाबीट्स से ख़ास बातचीत में संजीव ने अपने बिहार कनेक्शन के बारे में बताया और साथ ही अपनी फिल्म जबरिया जोड़ी  से जुड़े सवालों के जवाब भी दिए। 

बिहार से बॉलीवुड तक के अपने सफ़र के बारे में विस्तार से बताएं।

संजीव: मैं मोतिहारी का रहने वाला हूँ। 10+2 के लिए मुजफ्फरपुर आना हुआ और फिर मुज़फ़्फ़रपुर से दिल्ली। चूँकि क़िस्से-कहानियों में मन लगता था तो मैंने दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से लिटरेचर में ग्रेजुएशन किया। मेरे नाना जी, रमेशचंद्र झा, अपने समय के एक बड़े कवि और नॉवलिस्ट हुआ करते थे। वो फ़्रीडम फ़ाइटर भी थे – लेकिन लेगेसी जैसा कोई ख़याल मेरे ज़ेहन में नहीं था। मैं कुछ ढूँढ रहा था शायद, पता नहीं क्या। मैं दिल्ली घर से लगभग लड़ के आया था। फिर यहाँ जामिया के फ़ाइनल ईयर तक पहुँचते पहुँचते फ़िल्म फ़ेस्टिवल, साहित्य, हैबीटेट सेंटर, ब्रिटिश कॉउन्सिल लाइब्रेरी, NDS, FTII, JNU इन सबसे वास्ता पड़ने लगा था। मैं बस से न्यू फ़्रेंड्स कॉलोनी से मुनिरका जा कर वर्ल्ड सिनेमा की CD और DVD रेंट पर ला कर वो फ़िल्में देखा करता था। ‘सिटिज़न केन’, ‘बाइसिकल थीफ़’, ‘बारान’, ‘लाइफ़ इज़ ब्यूटीफुल’ जैसी फ़िल्में ऐसे ही देखी। जब दो बार कोशिश करने के बाद भी मेरा एडमिशन FTII में नहीं हुआ तो मैं अपनी किताबों और फ़िल्मों से भरा बैग उठा कर मुंबई आ गया। 2012 से 2018 तक कुछ कुछ लिखता रहा फिर विकास गुप्ता के लिए कुछ सिरीज़ लिखने लगा तो थोड़े पैसे आने लगे। सर्वाइवल ही तो विक्टरी है हम जैसों के लिए, वरना तो वापस आना पड़ेगा।

‘जबरिया जोड़ी’ का ख्याल कैसे आया और आपने इस कहानी की पृष्ठभूमि बिहार को ही क्यों चुनी?

संजीव: मैं कुछ सच्ची घटनाओं को ध्यान में रखकर लिखने की कोशिश कर रहा था। बायोपिक ट्राई किया तो वही चीज़ें कुछ और लोगों ने बना ली। फिर लिटरेचर को अडॉप्ट करने की कोशिश की, तो उसमें किसी की उतनी दिलचस्पी नहीं दिखी। तब कुछ ह्यूमर में लिखने की कोशिश की। आपके आस-पास से ही कहानियाँ मिलती है। मैंने क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो से डाटा निकला तो पता चला कि ये पकडुआ शादियाँ ख़ूब हो रही हैं। मैंने देखा की अब उतनी किड्नैपिंग फिरौती के लिए नहीं हो रही, जितनी शादियों के लिए हो रही हैं। इस चीज़ ने मेरा ध्यान खींचा था और फिर मुझे इस में एक यूनिवर्सल कहानी दिखी। ये सिर्फ़ बिहार का मसला नहीं है। आप पढ़ लीजिए, ये दुनिया के कई और भी देशों में हो रहा है। 2015-16 के आस पास मैंने जबरिया जोड़ी के आईडिया को डेवलप किया और किसी ऐसे इंसान की खोज में लग गया जो मेरी इस कहानी को लोगों के सामने ढंग से पेश कर सके। मैंने कई लोगों से बातचीत की, उनसे मिला, अपने विचार शेयर किए और इसी सिलसिले में मैं प्रशांत सिंह, जो कि इस फ़िल्म के डायरेक्टर हैं, से मिला। उसके बाद मेरा मिलना फिर शैलेश आर. सिंह से हुआ। ये लोग पहले दिन से मेरे साथ रहे।

बिहार का बैकड्रॉप इसलिए रखा क्यूंकि मैंने दुनिया वहीं देखी थी। वहीं के किरदार, वहीं के लोग, वहीं का नाच-गाना, तो वहीं बैकड्रॉप बन गया।

 

फ़िल्म की कहानी के बारे में बताएं और साथ ही हमारे पाठकों से यह भी साझा करें कि इस फिल्म को बिहार के दर्शक क्यों देखने जाएं।

संजीव: जबरिया जोड़ी दरअसल बिहार में प्रचलित पकडुआ विवाह पर आधारित एक रोमांटिक-कॉमडी है, जिसकी कहानी अभय सिंह नाम के एक दबंग लड़के और बबली यादव नाम की एक बोल्ड लड़की के इर्द-गिर्द घूमती है। ‘गन प्वाइंट मैरेज’ की पृष्ठभूमि में इन दो किरदारों का प्यार पनपता है और परवान चढ़ता है लेकिन फ़िल्म का टोन ट्रैजिक न होकर लाइट है। लिखते हुए यह कोशिश की गई है कि फ़िल्म सीरियस नहीं हो बल्कि मनोरंजक रहे ताकि दर्शक देखने आए और कुछ ना कुछ जानकारी भी लेकर जाएं। ‘जबरिया जोड़ी’ में आपको बिहार की बोली देखने को मिलेगी और बिहारी लैंग्वेज में कई डायलॉग भी सुनने को मिलेंगे। मज़ा आएगा देखकर।

मैं अपने स्टेट और अपने लोगों को लेकर, लड़कियों को लेकर, फ़ीमेल करैक्टर को लेकर बहुत संजीदा हूँ।

~ संजीव झा, लेखक जबरिया जोड़ी

अक्सर देखा जाता है कि बॉलीवुड में बिहारी भाषा का काफ़ी मखौल उड़ाया जाता है और एक मजाकिया लहज़े में बिहारियों का चित्रण भी किया जाता है। जबरिया जोड़ी वैसे सिनेमा से किस तरह अलग है?

संजीव: कहीं कोई मखौल नहीं है। मैंने हीरो ही बिहार का बनाया, तो अब क्या मखौल? टिपिकल बोली, टोन या बिहारी भाषा जिसे लोग कहते हैं, जिसका इस्तेमाल हिंदी सिनेमा में घिसा पिटा हो चुका है, उसे बिल्कुल आने नहीं दिया है। मैं अपने स्टेट और अपने लोगों को लेकर, लड़कियों को लेकर, फ़ीमेल करैक्टर को लेकर बहुत संजीदा हूँ। अभय और बबली हीरो हैं फ़िल्म के और लोग उनसे काफी प्रभावित होंगे। 

 

क्या फ़िल्म की शूटिंग बिहार में हुई है?

संजीव: कुछ सीन हैं पटना के लेकिन पूरी फ़िल्म लखनऊ में शूट हुई है। देखिए, फ़िल्म को कहाँ शूट किया जाए, ये बहुत हद तक लॉजिस्टिक्स पर निर्भर करता है जैसे कि आना-जाना, फ़्लाइट, रुकना, लोकेशन, सिक्यरिटी, पर्मिशन और फ़िल्म टाइमिंग। इन सब को देखते हुए प्रोड्यूसर्स को लखनऊ अच्छा लगा होगा। वैसे मैं यूपी और बिहार को अलग नहीं मानता। राजकपूर साहब इसे “पूरब” कहते थे। 

फ़िल्म के लीड रोल में आपने किसी बिहारी अभिनेता और अभिनेत्री को क्यों नहीं लिया?

संजीव: किसको लेता? आप बताइए विकल्प, सिद्धार्थ और परिणीति के एज ग्रूप, उनके स्टारडम, उनके अभिनय को ज़ेहन में रखते हुए। सुशांत सिंह राजपूत बिहार के हैं, वो कर रहे हैं लीड रोल कई फिल्मों में जहाँ वो गुजराती बने, बंगाली बने, भिंड-मुरैना के डाकू बने। ये ज़्यादा अच्छा है, बिहारी को पंजाबी किरदार भी करने चाहिए, और पंजाबी को बिहारी किरदार। मज़ा इसी में है। एक्टर का चैलेंज ही यही है। जब सैफ़ अली खान लँगड़ा त्यागी बन जाते हैं, तब मज़ा आता है देखने में। मुझे भी तब और मज़ा आएगा जब मैं कोई गुजराती, मुंबईया या दिल्ली के बैकड्रॉप की कहानी कहूँगा। और फिर ये भी ख्याल रखिए कि लीड रोल के चयन के पीछे बहुत और भी कारण होते हैं। वैसे बिहार-यूपी के कई एक्टर हैं जबरिया जोड़ी में। संजय मिश्रा सर बिहार के ही हैं।  वो भी लीड रोल में ही है। 

 

ट्रेलर से पता लगता है कि जबरिया जोड़ी बिहार के कुछ हिस्सों में फैली कुरीति पकड़ुआ विवाह को लेकर है। क्या आपकी फ़िल्म इस कुरीति के ख़िलाफ़ कोई संदेश दर्शकों को देती है?

संजीव: मैंने दहेज की दिक़्क़त को ऐड्रेस किया है इस मूवी में। शादी जिस तरह से सर का बोझ बन जाती लोगों के लिए उस चीज़ को दिखाने की कोशिश की है। कुछ ना कुछ संदेश हँसते-गाते तो मिलेगा ही। लेकिन कोई ज्ञान नहीं दे रहा हूँ। संदेश देने का भी एक तरीक़ा होता है लेकिन ज़रूरी है कहानी कहना, दर्शक बाक़ी अपने लिए चीज़ें निकाल लेते हैं।

 

फ़िल्म में एक प्रचलित पंजाबी गाने को भी जगह दी गई है और आपके मुताबिक ‘जबरिया जोड़ी’ की पृष्ठभूमि बिहार है। तो बिहार के क्षेत्रीय भाषाओं के गानों की जगह पंजाबी गाने को शामिल करने का क्या कारण है?

संजीव: बिहारी गाना भी है। “आरा हिले छपरा हिले” भी तो है! देखिए, इस बारे में कई दोस्तों से बात हुई कि जबरिया जोड़ी में पंजाबी गाना क्यों? लेकिन मैं यह कह रहा हूँ कि क्यों नहीं? क्या बिहार का कोई पंजाब कनेक्शन नहीं है? गुरु गोबिंद सिंह साहब बिहार के ही हैं। बिहार में रहकर उन्होंने इस मज़हब के लिए जो कुछ किया वो अतुलनीय  है। आप “अंगमाली डायरीज” देखिए – उसमें एक गाना है – “दो नैना”। केरला की कहानी, साउथ इंडियन फ़िल्म और बीच में एक सुंदर सा हिंदी गाना। कोई एक भाषा या बोली, किसी दूसरे देश या प्रदेश में नहीं आए ऐसा नहीं होना चाहिए। सबको सब जगह जाने दीजिए।

 

इस फ़िल्म के बाद अपने आगामी प्रोजेक्ट के बारे में कुछ बताएं।

संजीव: दो-तीन फ़ीचर फ़िल्मों की स्क्रिप्ट पिचिंग के लेवल पर है। मैं अपनी लिखी कहानियों को लेकर बहुत संवेदनशील हूं। मैं उन्हें बर्बाद होते नहीं देख सकता तो वो शिद्दत से बने, इस कोशिश में हूं। दो वेब सीरिज़ पर काम करना शुरू किया है जो कि लगभग ख़त्म है। जी फाइव पर मेरी एक फ़िल्म आ रही है – “बारोट हाउस”। ये एक डिजिटल फ़िल्म है, थ्रिलर है और यहाँ शायद राइटर का क्राफ़्ट दिखे। इसके बाद कबीर सिंह फ़िल्म के प्रोड्यूसर्स के लिए एक पॉलिटिकल सिरीज़ है। फिर अपने ही परिवार की कहानी लिखना शुरू करूंगा, जो आज़ादी की लड़ाई में शामिल हुए। मेरे दादा रमेशचंद्र झा की कहानी है, भारत छोड़ो आंदोलन के बैकड्रॉप पर। यह एक नॉवल होगा। एक और बुक भी अडॉप्ट कर रहा हूँ। मेरी जड़ें  लिटरेचर और अच्छा सिनेमा हैं, उधर ही लौटूँगा।

बिहार के युवा लेखकों और सिनेमा बनाने की चाहत रखने वालों के लिए कोई संदेश?

संजीव: यही कि ख़ूब पढ़ें और फ़िल्में देखें। प्रेमचंद के साहित्य से बाहर आ जाएँ, वो दुनिया अब नहीं रही। अपने समय को समझने के लिए पढ़ें और देखें। सिनेमा, आर्ट और कॉमर्स के साथ का क्राफ़्ट है। फ़िल्मकार या लेखक माँ के पेट से पैदा नहीं लेता, वो बनता है।

हमसे बात-चीत करने का वक़्त निकालने  के लिए संजीव झा का शुक्रिया और उनकी नयी फिल्म और आने वाले प्रोजेक्ट्स के लिए पटनाबीट्स की तरफ से शुभकामनाएं। 

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Quote of the day- “Originality is the fine art of remembering what you hear but forgetting where you heard it.”
– Laurence J Peter

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