आठवां ‘प्रतिरोध का सिनेमा: पटना फिल्मोत्सव’ युद्धोन्माद के खिलाफ केंद्रित होगा

आठवां ‘प्रतिरोध का सिनेमा: पटना फिल्मोत्सव’ युद्धोन्माद के खिलाफ केंद्रित होगा। 4 दिसंबर को अपराह्न 2 बजे कालिदास रंगालय में मशहूर वैज्ञानिक, शायर और फिल्मकार गौहर रजा इस त्रिदिवसीय फिल्मोत्सव का उद्घाटन करेंगे। एंटी-न्यूक्लियर एक्टिविस्ट कुमार सुंदरम और सेना के पूर्व कर्नल लक्ष्मेश्वर मिश्रा फिल्मोत्सव के मुख्य अतिथि होंगे। इस बार फिल्मोत्सव के दौरान दुनिया भर में विभिन्न भाषाओं में युद्ध के खिलाफ बनाई गई महत्वपूर्ण फीचर फिल्मों, डाक्यूूमेंट्री और एनिमेशन फिल्मों का प्रदर्शन होगा। आज फिल्मोत्सव तैयारी समिति की ओर से स्थानीय छज्जूूबाग में आयोजित प्रेस कांफ्रेन्स को संबोधित करते हुए फिल्मोत्सव स्वागत समिति के अध्यक्ष बिहार के सुुप्रसिद्ध रंग-निर्देशक कुणाल, रंगकर्मी संतोष झा और प्रीति ने यह जानकारी दी।
फिल्मोत्सव जंगखोर अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ क्यूबा समेत दुनिया के जनसंघर्षों के बेमिसाल कम्युनिस्ट नायक फिदेल कास्त्रो की स्मृति को समर्पित है। पहले दिन फिदेल के जीवन और संघर्ष पर कंेद्रित ‘फिदेल द अनटोल्ड स्टोरी’ का भी प्रदर्शन होगा। फिल्मोत्सव की शुरुआत गौहर रजा निर्देशित डाक्यूमेंट्री फिल्म ‘इंकलाब’ से होगी, जो भगत सिंह के जीवन और विचारधारा पर केंद्रित है। उसके बाद मशहूर फिल्मकार आनंद पटवर्धन की फिल्म ‘जंग और अमन’ का प्रदर्शन होगा, जो युद्धोन्मादी राष्ट्रवाद, कट्टरपंथ, युुद्धों के पीछे के आर्थिक स्वार्थ के पर्दाफाश करने के साथ उनका मुखर प्रतिवाद करती है। 
दूसरे दिन 5 दिसंबर को दिखाई जाने वाली फिल्मों में सोवियत वार ड्रामा फिल्म ‘कम एंड सी’ युद्ध की विनाशकारी संस्कृति का प्रतिरोध करती है। ‘क्या दिल्ली क्या लाहौर’ उस सियासत का विरोध करने वाली फिल्म है, जो भारत और पाकिस्तान की जनता को बांटती है। ‘लिटिल टेररिस्ट’ भी दो देशों के बीच युद्धोन्मादी अंधराष्ट्रवादी संस्कृति पर सवाल उठाती है। युद्ध की नृशंसता को बच्चे की निगाह से देखती फिल्म ‘टर्टलस कैन फ्लाई’ भी बेहद मार्मिक और युद्धविरोधी भावनाओं को पैदा करने वाली फिल्म है। 
आखिरी दिन 6 दिसंबर को दिखाई जाने वाली फिल्मों में ‘खामोश पानी’ की कहानी इस्लामिक कट्टरपंथ और जनरल जियाउल हक की ताानाशाही ने जो अमानवीय परिस्थितियां पैदा की थी उससे संबंधित है। ‘ग्रेव ऑफ दी फायरफ्लाईस’ जापानी एनिमेशन फिल्म है, जो सिनेमा के इतिहास में युद्ध के ऊपर बनी सबसे बेहतरीन फिल्मों में शुमार की जाती है। यह दर्शकों को युद्ध से घृणा के लिए प्रेरित करती है। इस फिल्म में भूख से मर गये एक लड़के की आत्मा हमें मानवता के सूक्ष्म निरीक्षण की ओर ले जाती है। ‘नाइट एंड फाॅग’ एक फ्रेंच फिल्म है, जिसमें नाजियों द्वारा फिल्माए गए अपनी ही क्रूरताओं के दृश्यों का फिल्मकार ने इस्तेमाल किया है। यह नाजियों की नृशंसता का दस्तावेज है। इसे देखते हुए अपने देश में वर्ण-व्यवस्था की नृशंसताओं के संदर्भ याद आ सकते हैं। संप्रदाय और जाति के वर्चस्व को बनाए रखने वाली शक्तियां हाल में अपनी ही नृशंसता को कैमरे के जरिए जिस तरह दृश्यबद्ध कर रही हैं, वह उसी नाजीवादी प्रवृत्ति से जुुड़ता है। फिल्मोत्सव की आखिरी फिल्म ‘सैराट’ जाति और लिंग के नाम पर कायम भेदभाव और अमानवीयता का प्रतिरोध करने वाली फिल्म है। यह समाज मंे अनवरत चलने वाले युद्ध का प्रतिकार है। 
फिल्मोत्सव के दूसरे दिन शाम में सेवानिवृृत्त कर्नल लक्ष्मेश्वर मिश्र युद्ध के पीछे की हकीकतों पर दर्शकांे से बातचीत करेंगे और आखिरी दिन युवा एंटी न्यूक्लियर एक्टिविस्ट कुमार सुंदरम परमाणुु परियोजनाओं के पीछे मौजूद पूंजीवादी स्वार्थ और उसके विनाशकारी दुष्प्रभाव को लेकर दर्शकों से बातचीत करेंगे।
फिल्मोत्सव के आखिरी दिन बच्चे युद्धोन्माद के खिलाफ पेंटिंग बनाएंगे और अपने लिए बेहतर भविष्य के स्वप्न को चित्रित करेंगे। फिल्मोत्सव आयोजन स्थल पर एक विशाल कमेंट वाॅल रहेगा, जिस पर दर्शक अपनी प्रतिक्रियाएं दर्ज करेंगे।
फिल्मोत्सव में इस बार दुुनिया के महान युद्धविरोधी चित्रकार फ्रांसिस्को गोया के चित्रों की प्रदर्शनी लगाई जाएगी। हमेशा की तरह किताबों और फिल्मों का स्टाॅल भी होगा।

पूरा फिल्मोत्सव निःशुुल्क रहेगा।

फिल्मोत्सव में प्रदर्शित की जाने वाली फिल्मों का विवरण

4 दिसंबर: इन्किलाब

गौहर रजा द्वारा निर्देशित ये डाक्यूमेंट्री भगत सिंह के बारे में है.  चालीस मिनट की इस फिल्म में भगत सिंह के जीवन से जुडी जगहों और उनके जीवन वृत्त के साथ साथ, भगत सिंह की शहादत को श्रध्हांजलि भी दी गयी है. भगत कैसे भारतीय स्वाधीनता संग्राम के परिपेक्ष्य में धीरे धीरे एक  दूरदर्शी राजनीतिक विचारक बन जाते हैं, इस यात्रा पर ये फिल्म निकलती है. ऑडियो विडियो प्रारूप में भगत सिंह की बौद्धिक जीवनी को दिखाने का एक प्रयास भी है ये फिल्म. गौहर राजा की फिल्म भगत सिंह को उनके बाद की पीढ़ियों के नजर से देखते हुए उनकी शहादत को सलाम करती है.

जंग और अमन

आनंद पटवर्धन की इस फिल्म को प्रदर्शित होने से पहले बहुत कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी. सत्ताधारी ताकतों और फासीवादी शक्तियों से इस संघर्ष का कारण ये था कि फिल्म युद्धोन्मादी राष्ट्रवाद के खिलाफ कई सवाल खड़े करती है. गांधी की हत्या से शुरू होने वाली ये फिल्म युद्ध सम्बंधित अमेरिकी और अन्य देशों में प्रचलित मान्यताओं जैसे एटम बम से विश्व शांति, वार इकॉनमी आदि मुश्किल सवालों और उनके जवाबों से जूझती है. भारत का पोखरण परिक्षण, पाकिस्तान से युद्ध जैसे हालात पैदा होना , और युद्ध को लेकर  आम स्मृति से आतंक के मिट जाने के बाद हिरोशिमा और नागासाकी के परिणामों की स्मृतियों को फिर से कुरेदने का काम ये फिल्म गंभीरता से करती है.  और निर्देशक की कसौटी  पर कट्टरपंथ और उग्र राष्ट्रवाद का आंकलन तो होता ही है.

फिदेल द अनटोल्ड स्टोरी

एस्टेला ब्रावो मेजमसं ठतंअव द्वारा निर्देशित यह डाक्यूूमेंट्री फिल्म जाने माने इतिहासकारों, मार्खेज जैसे साहित्यकार, नागरिकों, उनके मित्रों और क्यूबा के स्टेेट अर्काइव्स के कुुछ दुुर्लभ फुटेज के जरिए फिदेल कास्त्रो के विलक्षण क्रांतिकारी व्यक्तित्व और उनकी ऐतिहासिक भूमिका को समझने की एक कोशिश है। यह फिल्म 2001 में प्रदर्शित हुुई थी।

5दिसंबर: कम एंड सी

उन्नीस सौ पचासी में बनी ये सोवियत वार ड्रामा फिल्म, युद्ध की स्थितियों का विश्लेषण करती है. क्लिमोव अपनी फिल्म का कथानक नाजी जर्मनी द्वारा बेलारूसियन संघ पर कब्जे के समय में स्थित करते हैं. सोवियत संघ में ये फिल्म काफी चर्चित रही. इसका शीर्षक बाइबिल से लिया गया है. अपने सन्दर्भ की तरह फिल्म का शीर्षक भी दर्शकों को युद्ध की वजह से हुए विनाश को देखने के लिए आमंत्रित करता है.  ये फिल्म दर्शकों से साहस की मांग भी करती है कि वो फिल्म में दिखाई वास्तविकता झेल सकें. मानवता के विकास और युद्ध की संस्कृति पर अहम् सवाल खड़े करते हुए ये फिल्म कड़े सचों को कहने में कोई गुरेज नहीं करती.

क्या दिल्ली क्या लाहौर

जिनकी भाषा, तहजीब, नायक, संवेदनाएं, खेल और यहाँ तक की गालियाँ भी एक हों, वहां क्या दोस्त और दुश्मन की परिभाषाएं बनाई जा सकती हैं? दो देश जिन्होंने साथ लड़ाइयाँ लड़ी हों, साथ संघर्ष किया हो और साथ साथ चोटें झेली हों, क्या उनके बीच ऐसा समय भी आ सकता है कि संवाद के लिए भी सोचना पड़े. महज एक लकीर खींच कर लोगों को बाँट देने से सब कुछ नकार दिया जा सकता है?ये बहस वहां होती है जहाँ लकीर खिंची और सब अलग अलग हो गया.  विजय राज की ये फिल्म जो सबसे अहम मुद्दा उठाती है वो ये है कि कैसे सियासतें अपने फायदे के लिए आदमियत का बंटवारा कर देते हैं. ये फिल्म ये याद दिलाती है कि बस जमीन बांटी गयी. वस्तुतरू दिल्ली और लाहौर दोनों एक ही हैं.

लिटिल टेररिस्ट

मानवीय संवेदनाओं और प्रेम को सीमाएं और सियासत समझ नहीं आतीं. एक बच्चा है. शायद दस साल का हो. पाकिस्तानी है पर हिन्दुस्तानी या पाकिस्तानी होने का मतलब क्या है ये नहीं जानता. एक बाड़ के नीचे की रेत हटाते हुए खेल खेल में हिंदुस्तान पहुँच जाता है, सायरन बजते हैं, गोलियां बरसती हैं. तलाशी हो रही है कौन घुसपैठिया है. बंटवारे की दीवार, धर्म की दरारें, उसकी वजह से फैली नफरत और एक दस साल का बच्चा – जमाल और जवाहरलाल के बीच का फर्क दिखाने में फिल्म सक्षम है. अश्विनी कुमार की ये फिल्म अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रही. इंसानियत से भारी है इंसान की बनाई दीवारें.  कैसी कैसी जंगें हैं और कैसे कैसे लोग. पंद्रह मिनट में दर्शक सब देख लेते हैं.  शार्ट  फिल्म श्रेणी में ये फिल्म मील का पत्थर साबित हुई.

टर्टलस कैन फ्लाई

 पर्शियन भाषा में बनी बहमन घोबड़ी की ये फिल्म एक कुर्दिश वार ड्रामा है. दो हजार चार में आई ये फिल्म सद्दाम हुसैन के सत्ता से हटने के बाद इराक में बनी पहली फिल्म थी. इराकी-तुर्की सीमा पर बने एक कुर्दिश रिफ्यूजी कैंप में रहने वाला सॅटॅलाइट ( डिश ऐन्टेना लगाने के कारण उसका ये नाम पड़ता है.) थोड़ी बहुत अंग्रेजी जानता है और कैंप के बच्चों का लीडर है.  वो लैंड माइंस के सौदे भी करता है और अपना ऐन्टेना लगाने का काम भी पूरी तन्मयता से करता है.
हमारे समय की त्रासदी ये है कि ये युद्ध कभी खत्म नहीं होते और युद्ध की गोद में पल रहे छोटे बच्चे दूसरी दुनिया नहीं जानते. स्वतरू स्वीकृति,  सॅटॅलाइट की माँ की कहानी, उसके परिवार का कत्ल और तमाम ऐसी क्रूरताएं जिनकी ओर सभ्य समाज ताकना नहीं चाहता, फिल्म में कदमताल करती हैं और आँखें खोलती हैं.

6 दिसंबर: खामोश पानी

ये कहानी एक पाकिस्तानी पंजाबी गाँव में रहने वाली आयशा और उसके बेटे सलीम की है.  गाँव के बच्चों को कुरान पढ़ा कर आयशा  अपनी बसर करती है. इस्लामिक कट्टरपंथी गाँव आते हैं और अफगानिस्तान की ओर से रुसी आक्रमण से लड़ने के लिए लोगों को भरती करना चाहते हैं . भारत से आये सिख तीर्थयात्रियों के साथ क्या होता है, जनरल जियाउल हक की लोकशाही विरोधी नीतियाँ, पाकिस्तान की सैनिक शासित जनसँख्या. सबीहा सुमर और किरण खेर को इस फिल्म के लिए कई पुरस्कार दिए गये और फिल्म की चर्चा दुनिया भर में हुई. मध्य एशिया में इस्लामिक चरमपंथी आतंकवाद के फिर से उभार के कारण फिल्म काफी प्रासंगिक हो जाती है. साथ ही धार्मिक उन्माद के विकृत चेहरे को पूरी रौशनी में दर्शकों के सामने रखती है.

ग्रेव ऑफ दी फायरफ्लाईस

जापान में एनिमेशन विधा में भी काफी गंभीर काम होता है. इसाओ तकाहाता की ये फिल्म एक वार ड्रामा है. अकियुकी नोसका की लघु कहानी पर बनी इस फिल्म में कई आत्मकथात्मक प्रसंग भी हैं. भाई और बहन, द्वितीय विश्व युद्ध के आखिरी महीनों के दौरान किस तरह जीवन के लिए संघर्ष करते हैं, फिल्म इसकी कहानी है.  सिनेमा के इतिहास में युद्ध के ऊपर बनी सबसे बेहतरीन फिल्मों में शुमार की जाने वाली इस फिल्म में भूख से मर गये एक लड़के की आत्मा हमें मानवता के सूक्ष्म निरीक्षण की ओर ले जाती है. युद्ध का यथार्थ की तरफ ले जाती फिल्म, युद्ध से जुड़े, नायकत्व और पुरुषार्थ के भ्रम से भी लोगों का परिचय कराती है और दिखाती है कि कैसे युद्ध कुत्सित है और इस से बस घृणा होनी चाहिए.

नाइट एंड फाॅग

यह एक फ्रेंच डाॅक्यूमेंट्री फिल्म है।

आखिरी फिल्म : सैराट

निर्देशक: नागराज मंजुुले

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