1758 से चला आ रहा है भारत का गौरवशाली रेजिमेंट – बिहार रेजिमेंट

हवलदार सुनील कुमार, सिपाही कुंदन कुमार ओझा, सिपाही चंदन कुमार, सिपाही अमन कुमार, सिपाही जय किशोर सिंह और सिपाही कुंदन कुमार ये यूंही कोई मामुली नाम नहीं है। ये सब वो शहीद हैं जिनके ऋण से इस देश की मिट्टी और भी मूल्यवान हो गई है।

बीते कुछ दिनों के गतिविधियों के दौरान इन्होंने जिस तरीके से शक्ति शौर्य और देशभक्ति दिखाई, वो ना सिर्फ काबिल-ए-तारीफ़ थी बल्कि एक ज़रूरी कदम भी था।

बिहार रेजिमेंट के इन जवानों की शहादत की खबर लगते ही ना सिर्फ उनके परिवार वालों में बल्कि पूरे देश में मानो एक बिजली ही गिर गई हो। एक पल को तो दानापुर छावनी में भी मातम छा गया पर उस गम को गर्व में तब्दील होने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगा।

बिहार रेजिमेंट का इतिहास यूंही गौरवशाली नहीं है अनेक सैनिकों के बलिदान और खून से सीचा हुआ एक उपजाऊ ज़मीन है। यहां हर एक शक्स खुद में ख़ास है।

बात अगर 1944 में जापानी सेना से सामना करने की हो जहां बिहार रेजिमेंट के जवानों को लुशाई ब्रिगेड में शामिल कर भेजा गया या बात 1965 और 1971 की करें जहां भारत – पाक युद्ध में हमारे जवानों ने अतुलनीय वीरता दिखाई थी। 1999 का कारगिल युद्ध तो कोई भूल भी नहीं सकता जहां बटालिक सेक्टर और प्वाइंट 4268 को दुश्मनों के चंगुल से बड़ी बहादुरी से छुड़ाया गया था।

हालांकि, बिहार रेजिमेंट के योद्धाओं की वीरगाथा 1758 में ही शुरू हुई थी। अप्रैल 1758 में तीसरी बटालियन की पटना में हुई स्थापना के बाद से बिहार के जवानों ने अपनी वीरता की कहानी लिखनी शुरू कर दी थी। कैप्टन टर्नर इस बटालियन की कमान संभालने वाले पहले अधिकारी थे। अंग्रेजों के कब्जे के बाद जून 1763 में मीर कासिम ने पटना पर हमला बोला।

बिहारी रेजिमेंट की तीसरी बटालियन के चंद सैनिकों ने मीर कासिम की विशाल सेना को पीछे धकेल दिया। अंग्रेजी सेना द्वारा मदद नहीं मिलने के चलते मीर कासिम की सेना विजयी रही। अंग्रेजों की तीन बटालियन समाप्त हो गयी। बंगाल, बिहार और ओड़िसा पर पुनः राज्य स्थापित करने के लिए बिहारी सैनिकों को लेकर अंग्रेजों ने 6 ठी, 8 वीं और 9 वीं बटालियन बनाई। इन्होंने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से पहले की कई लड़ाइयों में अपनी वीरता का लोहा मनवाया।

वैसे असल कहानी इस रेजिमेंट की और भी पुरानी है और जबरदस्त भी। बात है बाबा कुंवर सिंह की, जुलाई 1857 में दानापुर स्थित 7वीं और 8 वीं रेजिमेंट के सैनिकों ने विद्रोह का बिगुल फूंकते हुए अंग्रेजों पर गोलियां बरसायीं। हथियार और ध्वज लेकर सैनिक जगदीशपुर चले आये और बाबू कुंवर सिंह के साथ शामिल हो गए। इन सैनिकों के साथ मिलकर बाबू कुंवर सिंह ने आरा पर आक्रमण कर दिया। अंग्रेजों की सेना को शिकस्त दे आरा पर कब्जा कर लिया गया। इस हार से अंग्रेजी हुकूमत में खलबली मच गयी। हालांकि युद्ध के दौरान लगी गोलियों के घाव से बाबू कुंवर सिंह की मृत्यु हो गयी। बिहारी सैनिकों के शौर्य से अंग्रेज इतने डर गए की 12 को छोड़ कर सभी यूनिटें भंग कर दी। 1941 तक अंग्रेज बिहारी सैनिकों को लेकर एक भी बटालियन बनाने की हिम्मत नहीं जुटा सके थे।

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