सहजानंद सरस्वती, किसान आंदोलन के महानायक

स्वामी सहजानंद सरस्वती

स्वामी सहजानंद सरस्वती, ये वो नाम हैं जिनके आगमन से किसानों की मुसीबतों पर ढाल की तरह खड़े थे हुआ था। इनका जन्म 22 फरवरी 1889 गाज़ीपुर में हुआ था। ये एक राष्ट्रवादी नेता और स्वतंत्रता सेनानी भी थे।

अगर हम बात अंग्रेजों के खिलाफ आवाज़ उठाने की करें तो किसान आंदोलन के जनक और महानायक थे स्वामी जी। शंकराचार्य संप्रदाय के सन्यासी थे। स्वामी जी की मृत्यु 1950 में राज्य बिहार के पटना में हुआ था।

स्वामी सहजानंद जी से जुड़ी कुछ बातें,

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने स्वामी सहजानंद सरस्वती जी को एक विस्तार वैज्ञानिक / कार्यकर्ता के रूप में पुरस्कृत किया। वर्ष 2001 में, स्वामी सहजानंद सरस्वती जी की 112 वीं जयंती के अवसर पर दो दिवसीय किसान महापंचायत का आयोजन किया गया था।

बिहार के राज्यपाल आर.एस गावई ने पटना में स्वामी जी की 57 वीं पुण्यतिथि पर उनके जीवन पर एक पुस्तक जारी की। स्वामी सहजानंद सरस्वती का जन्म महाशिवरात्रि के दिन एक निम्न मध्यवर्गीय किसान परिवार में हुआ था।

वह सत्यनिष्ठ विचारक, जिज्ञासु, कर्मशील, क्रन्तिकारी, सक्रिय वेदांत के मर्मज्ञ, मीमांसा के ज्ञाता, बहुपठित शास्त्रज्ञ, वर्ग-संघर्ष के पैरोकार, राष्ट्रवादी-वेदांती मार्क्सवादी थे।

 

उन्होंने प्राथमिक शिक्षा शास्त्रीय ढंग से, स्वाध्याय से और स्वयं के जीवन संघर्ष से प्राप्त की थी। स्वामी सहजानंद ने वेदान्तों के विचारों को दैनिक जीवन में प्रचलित किया था।

गीताधर्म के अंतर्गत मार्क्स, इस्लाम, ईसाई सभी को पर्याप्त जगह दी थी। वेदांतो के अर्थ के अनुसार धर्म, कार्य, मोक्ष में मार्क्स के अर्थ को प्रथम स्थान दिया और इसी कारण उन्होंने राजनीति को आर्थिक कसौटी के रूप में अपनाया, जब्कि उनके विपरीत दूसरे लोग राजनीति को आर्थिक नीति के रूप में देखते थे।

जिसके चलते स्वामी जी ने उग्र अर्थवाद, वर्ग संघर्ष, किसान के हितों के प्रति लड़ने के लिए क्रांति जैसे रास्ते को अपनाया।

वर्ष 1917 में, गाजीपुर के जर्मन मिशन स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने अट्ठारह वर्ष की उम्र में संन्यास ले लिया।

संन्यासी बन कर स्वामी जी ने ईश्‍वर और सच्चे योगी की खोज में हिमालय, विंध्यांचल, जंगलों, पहाड़ों और गुफाओं की यात्रा की, जिसके चलते उन्होंने काशी और दरभंगा के विशिष्ट विद्वानों के संग वेदांत, मीमांसा, न्याय शास्त्र का गहन अध्ययन किया।

वर्ष 1919 में, बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु से उपजी संवेदना के कारण स्वामी जी राजनीति की ओर अग्रसर हुए, जिसके चलते उन्होंने तिलक स्वराज्य फंड के लिए कोष इकट्ठा करना शुरू किया।

5 दिसम्बर 1920 में, उन्होंने पटना में मजहरुल हक नामक स्वतंत्रता सेनानी के निवास पर ठहरे महात्मा गांधी से मिलकर कांग्रेस में शामिल होने का निश्चय किया। वर्ष 1927 में, स्वामी जी ने पश्‍चिमी किसान सभा की नींव रखी, जिसमें उन्होंने मन से दुःखी शोषितों के लिए संघर्ष किया।

इसके परिणामस्वरूप स्वामी जी ने ‘मेरा जीवन संघर्ष’ पुस्तक लिखी। वर्ष 1929 में, सोनपुर मेले के अवसर पर स्वामी जी ने बिहार प्रान्तीय किसान सभा की नींव रखी, जिसके अध्यक्ष स्वामी सहजानन्द और सचिव डॉ. श्रीकृष्ण सिंह थे।

17 नवंबर 1929 को, उन्होंने गठित बिहार प्रान्तीय किसान सभा को विस्तारित कर 11 अप्रैल 1936 को अखिल भारतीय किसान सभा को पुनर्गठित किया।

कांग्रेस में रहते हुए स्वामीजी ने किसानों को जमींदारों के शोषण और आतंक से मुक्त करवाने के लिए अभियान जारी रखा। उनकी बढ़ती सक्रियता को देखकर ब्रिटिश हुकूमत सहम गई और उन्हें जेल में डाल दिया।

वर्ष 1934 में, जब बिहार प्रलयंकारी भूकंप से तबाह हुआ था, तब स्वामीजी ने बढ़-चढ़कर राहत और पुनर्वास के कार्यों में भाग लिया था, लेकिन उस समय वहां किसान जमींदारों के अत्याचारों से पीड़ित थे क्योंकि जमींदारों के लठैत किसानों को कर भरने के लिए प्रताड़ित कर रहे थे।

उसी समय स्वामी जी पटना में कैंप कर रहे महात्मा गांधी से मिले और वहां की जनता का हाल सुनाया तभी गांधीजी ने कहा “मैं दरभंगा महाराज से मिलकर किसानों के लिए ज़रूरी अन्न का बंदोबस्त करने के लिए कहूंगा।”

इतना सुनकर स्वामी जी गुस्से से लाल हो गए और वहाँ से चले गए और जाते-जाते उन्होंने गांधीजी को कहा कि “अब आपका और मेरा रास्ता अलग-अलग है।”

स्वामी जी के जीवन का तीसरा चरण तब शुरू हुआ था जब कांग्रेस में रहते हुए उन्होंने किसानों को हक दिलाने के लिए संघर्ष को ही अपने जीवन का लक्ष्य घोषित किया तब उन्होंने यह नारा दिया- “कैसे लोगे मालगुजारी, लट्ठ हमारा ज़िन्दाबाद।”

वर्ष 1949 में, महाशिवरात्रि के पर्व पर स्वामी जी ने पटना के समीप बिहटा में सीताराम आश्रम को स्थापित किया जो किसान आंदोलन का केन्द्र बना। वहीं से वह पूरे आंदोलन को संचालित करते थे।

जमींदारी प्रथा के ख़िलाफ़ लड़ते हुए स्वामी जी का 26 जून 1950 को मुजफ्फरपुर में उच्च रक्तचाप से निधन हो गया था। 26 जून 2000 को, भारत सरकार ने तत्कालीन संचार मंत्री राम विलास पासवान द्वारा स्वामी जी की स्मृति में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया।

 

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